Bhajana Gīti
Kirtan

सपार्षद भगवद्-विरहजनित-विलाप’

Narottama Dāsa Ṭhākura1 min read
KrishnaMahaprabhuBhakti
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ये आनिल प्रेमधन करुणा प्रचुर।हेन प्रभु कोथा गेला आचार्य ठाकुर? ॥ 1॥
काँहा मोर स्वरूप-रूप, काँहा सनातन?काँहा दास - रघुनाथ पतितपावन? ॥ 2॥
काँहा मोर भट्टयुग, काँहा कविराज?एककाले कोथा गेला गोरा नटराज? ॥ 3॥
पाषाणे कुटिब माथा अनले पशिब?गौरांग गुणेर निधि कोथा गेले पाब? ॥ 4॥
से सब संगीर संगे ये कैल विलास।से-संग ना पाञा कान्दे नरोत्तमदास॥ 5॥

अतिशय करुणा करके जो प्रेमधन को लाये थे, वे आचार्य ठाकुर कहाँ चले गये? कहाँ मेरे वे स्वरूप दामोदर हैं, कहाँ वे रूप गोस्वामी जी हैं, कहाँ सनातन गोस्वामी जी हैं तथा कहाँ वे पतित-पावन रघुनाथ दास गोस्वामी जी हैं? कहाँ मेरे गोपाल भट्ट गोस्वामी जी हैं, कहाँ मेरे रघुनाथ भट्ट गोस्वामी जी हैं तथा कहाँ मेरे वे कृष्णदास कविराज गोस्वामी जी हैं? ये सभी के सभी गौरजन एक साथ कहाँ चले गये? मैं पत्थर पर अपना सिर पटक दूँ या आग में कूद जाऊँ —मैं कहाँ जाऊँ — वे गौरांग गुणनिधि मुझे कहाँ जाने से मिलेंगे। उन महाप्रभु जी के संगियों के संग जिन्होंने लीला विलास की, उन सब को न पाकर श्रीनरोत्तम दास ठाकुर जी हर समय रोते रहते हैं।

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