भकतिविनोद, एइ आशा करि’, बसिया गोद्रुमवने।प्रभु-कृपा लागि, व्याकुल अन्तरे, सदा काँदे संगोपने॥
हे हरि! कब मेरा वह दिन होगा जब निर्मल-वैष्णवों में मेरी प्रीति उपजेगी और सांसारिक-विषयों की वासना क्षीण होगी। मेरा अन्दर का व बाहर का व्यवहार समान होगा। मैं अमानी-मानद होऊँगा तथा हमेशा ही श्रीकृष्ण-संकीर्तन व श्रीकृष्ण-स्मरण में व्यस्त रहूँगा। जीवन यापन के लिए अभ्यास से ही इस देह की क्रियाएँ करूँगा। श्रीकृष्ण-भजन में जो-जो भी अनुकूल होगा, उसके प्रति अनुराग रखूँगा तथा जो-जो भजन में प्रतिकूल होगा, उसे दृढ़ता से त्याग दूँगा। इस प्रकार भजन करते-करते जब समय आयेगा तो इस देह को छोड़ दूँगा। भक्ति विनोद ठाकुर जी कहते हैं कि इसी आशा से मैं गोद्रुम वन में बैठा हुआ हूँ तथा व्याकुल हृदय से प्रभु की कृपा प्राप्त करने के लिए एकान्त में रोता रहता हूँ।