ये येन वैष्णव, चिनिया लइया, आदर करिब यबे।वैष्णवेर कृपा, याहे सर्वसिद्धि, अवश्य पाइब तबे॥
वैष्णव चरित्र, सर्वदा पवित्र, येइ निन्दे हिंसा करि’।भक्तिविनोद, ना सम्भाषे तारे, थाके सदा मौन धरि॥
हे हरि! कब मैं वैष्णवों को पहचानूँगा। वैष्णवों के चरण जो कल्याण की खान हैं, को हृदय में धारण करके मैं मतवाला होऊँगा। जो वैष्णव होते हैं, वे निर्दोष अप्राकृत एवं हमेशा आनन्द में विभोर रहते हैं, उनकी कृष्ण-नाम में प्रीति होती है। संसार की जड़ीय वस्तुओं के प्रति उनकी उदासीनता रहती है तथा जीवों के प्रति उनका दयार्द्र भाव रहता है। वे जागतिक-अभिमानों से शून्य रहते हैं परन्तु हरि-भजन में पारंगत होते हैं तथा विषयों के प्रति वे अनासक्त रहते हैं। वे अन्दर से व बाहर से हमेशा निष्कपट होते हैं तथा भगवान् की नित्य लीला में उनकी अनुरक्ति होती है। कनिष्ठ, मध्यम, व उत्तम के भेद से उनकी (वैष्णवों की) तीन प्रकार की श्रेणियाँ गिनी जाती हैं। ऐसा सुनने में आता है कि कनिष्ठ वैष्णव के प्रति आदर भाव रखना चाहिये, मध्यम वैष्णव के प्रति प्रणम्य का भाव अर्थात पूज्य का भाव तथा उत्तम वैष्णव की सेवा-शुश्रुषा करनी चाहिए। वैष्णव कृपा, जिससे सर्वसिद्धि होती है — ये अवश्य ही आपको तब प्राप्त होगी जब आप, जो जिस श्रेणी का वैष्णव है, उसे पहचान कर उसके मुताबिक ही उसका आदर करेंगे। वैष्णव चरित्र सर्वदा ही पवित्र है। जो वैष्णवों की निन्दा करते हैं या उनके प्रति ईर्ष्या का भाव रखते हैं, श्रील भक्तिविनोद ठाकुर जी कहते हैं कि वे उनसे बात भी नहीं करते हैं, चुपचाप रहते हैं।