ना लइनु सत मत,असते मजिल चित्त,तुया पाये ना करिनु आश।नरोत्तमदासे कय,देखि’ शुनि लागे भय,तराइया लह जिन पाश॥
हे ठाकुर वैष्णवगण! मैं एक निवेदन करता हूँ — वह ये कि मैं बड़ा अधम व दुराचारी हूँ। ये संसार रूपी समुद्र बड़ा भयंकर है और विधि ने मुझे इस दारुण संसार-सागर में डुबो दिया है। आप ही मेरे केश पकड़ कर मुझे पार कीजिये। ये विधि बहुत बलवान है, किसी भी प्रकार के धर्म की व ज्ञान की बात ये नहीं सुनता, जीवों को सदा ही कर्मपाश में बाँध कर रखता है। मेरी तो ऐसी अवस्था हो गयी है कि मैं किसी तरफ भी पार होने का लेशमात्र उपाय भी नहीं देखता हूँ। जिधर भी देखता हूँ उधर क्लेश ही क्लेश मुझे दीखते हैं। इसलिए मैं अपने-आपको अनाथ सा महसूस करता हूँ और कातरता से रो रहा हूँ। ये काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अभिमान भी इनके साथ हैं — ये सभी मुझे अपनी-अपनी ओर खींच रहे हैं और मेरा मन ऐसा है, जैसे कोई अन्धा व्यक्ति हो और अपना सुपथ-विपथ भी न जानता हो। मैंने कोई सत्पथ नहीं लिया, हमेशा ही असत् में मेरा चित्त रमा रहा, आपके चरणों का भी मैंने आश्रय नहीं लिया। श्रील नरोत्तम ठाकुर जी कहते हैं कि हे वैष्णवगण! इस संसार की दारुण अवस्था देख-सुन कर मुझे डर लग रहा है, अब आप ही मुझे पार करके अपने पास रख लीजिये।