Bhajana Gīti
Kirtan

श्रीवैष्णव कृपा-प्रार्थना

Gauḍīya Vaiṣṇava Tradition2 min read
KrishnaHarinamBhakti
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ओहे!वैष्णव ठाकुर, दयार सागर, ए दासे करुणा करि ।दिया पदछाया, शोध हे आमाय, तोमार चरण धरि॥ 1॥
छय वेग दमि’, छय दोष शोधि’, छय गुण देह दासे।छय सत्संग, देह हे आमारे, बसेछि संगेर आशे ॥ 2॥
एकाकी आमार, नाहि पाय बल, हरिनाम संकीर्तने ।तुमि कृपा करि’, श्रद्धाबिन्दु दिया, देह’ कृष्ण-नाम-धने॥ 3॥
कृष्ण से तोमार, कृष्ण दिते पार, तोमार शकति आछे।आमि त कांगाल, ‘कृ ष्ण’ ‘कृष्ण’ बलि, धाइ तव पाछे पाछे॥ 4॥

हे वैष्णव ठाकुर! दया के सागर! इस दास पर करुणा करो। अपनी पदछाया देकर मेरा शोधन करो, मैं आपके चरण पकड़ता हूँ। (1) कृपा करके ऐसी शक्ति प्रदान करो कि मैं छः वेगों 1 का दमन कर सकूँ, छः दोषों 2 का शोधन कर सकूँ तथा छः गुण 3 इस दास को दीजिये एवं छः प्रकार का सत्संग 4 मुझे दीजिये — मैं संग की ही आशा से बैठा हुआ हूँ। (2) अकेले रहकर हरिनाम संकीर्तन में मुझे ताकत नहीं मिलती, आप ही कृपा करके श्रद्धा का बिन्दु मात्र प्रदान करके मुझे श्रद्धा भी दीजिये एवं कृष्णनाम धन भी दीजिये। (3) कृष्ण आपके हैं। आप कृष्ण को दे सकते हैं। आपके पास ताकत है। मैं तो कंगाल हूँ, कृष्ण-कृष्ण कहकर आपके पीछे-पीछे दौड़ रहा हूँ। (4)

1- छय वेगः- वाक्य वेग, मनोवेग, क्रोध वेग, जिह्वा वेग, उदर वेग, और उपस्थ वेग। 2- छय दोषः- अत्याहार, जड़ विषय के लिए प्रयास, ग्राम्य-कथा, असत्-जनसंग, अस्थिर सिद्धान्त या इन्द्रियतर्पण में रुचि। 3- छय गुणः- भजन में उत्साह, भक्ति में दृढ़ विश्वास, प्रेम लाभ में धैर्य, भक्ति अनुकूल कर्मप्रवृत्ति, असत्संग त्याग और भक्ति सदाचार। 4- छय सत्संगः- शुद्ध-भक्तों को देना, भक्त यदि कृपा करके कु छ देने लगे तो प्रीतिपूर्वक उसे लेना, शुद्ध-भक्तों से हरि-चर्चा करना तथा उनसे हरि-कथा सुनना, भक्तों को भोजन करवाना तथा उनके पवित्र हाथों से भगवान का प्रसाद लेकर ग्रहण करना।

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