हे वैष्णव ठाकुर! आप मुझ पर कृपा कीजिये जैसे भगवान से अपने सम्बन्ध को जानकर, सम्बन्ध-ज्ञान के साथ भजन करते-करते मेरे अन्दर जो अभिमान है, वह दूर हो जाये। मैं वैष्णव हूँ — इस प्रकार की बुद्धि होने से मैं अमानी नहीं हो पाऊँगा, प्रतिष्ठा की आशा आकर मेरे हृदय को दूषित कर देगी और मैं नरकगामी हो जाऊँगा। हे वैष्णव ठाकुर! आप मुझ पर ऐसी कृपा करें जैसे मैं अपने बड़प्पन के अभिमान को त्यागकर अपने आपको आपके दासों का दास समझूँ तथा आपका जूठा प्रसाद व आपके चरणों की धूलि का मैं सेवन कर सकूँ। अपने आपको श्रेष्ठ समझने से, दूसरों को अपना जूठा देने से अभिमान का भार सिर पर आ पड़ेगा। इसलिए हर समय अपने-आपको आपका शिष्य मानकर व उसी प्रकार रह कर किसी की भी पूजा को ग्रहण नहीं करूँगा। अमानी-मानद होने से ही तो आप कीर्त्तन का अधिकार देंगे। निष्कपटतापूर्वक आपके चरणों की रज को मैं रोते हुए लूटूँगा।