वैष्णव ठाकुरों के श्रीचरण ही पृथ्वी की सम्पदा हैं। हे भाई! एकाग्रमन से सुनो — जो वैष्णवों का आश्रय लेकर भजन करता है — उन्हें श्रीकृष्णपरित्याग नहीं करते, बाकी सब तो व्यर्थ में ही जीवन गँवा देते हैं। वैष्णवों केचरणों का जल प्रेम-भक्ति में शक्ति प्रदान करता है। इसके समान और कोईशक्तिशाली नहीं है। वैष्णवों के चरणों की रज ही मस्तक का आभूषण है।इसके समान और कोई आभूषण भी नहीं है। तीर्थजल की पवित्रता की बातेंपुराणों में लिखी गयी हैं परन्तु वह सब भक्ति की प्रवन्चनामात्र हैं। वैष्णवों काजो चरण-धौत जल है उसके समान प्रेम-भक्ति प्रदान करने में कोई भी समर्थनहीं है क्योंकि यह सभी प्रकार के मनोभीष्टों को पूरा करने वाला है। वैष्णवों केसंग में मन हमेशा आनन्दित रहता है क्योंकि उनके साथ रहने से हमेशा कृष्ण-प्रसंग चलता रहता है। श्रीनरोत्तम दास ठाकुर जी रोते-रोते कहते हैं कि मैं अबऔर धैर्य धारण नहीं कर पा रहा हूँ — मेरी ये स्थिति क्यों भंग हो गयी?शुद्ध - भकत चरण - रेणु, भजन अनुकूल ।भकत - सेवा, परम सिद्धि, प्रेमलतिकार मूल ॥ 1॥
भकतिविनोद, कृष्ण भजने, अनुकूल पाय याहा।प्रति-दिवसे, परम सुखे, स्वीकार करये ताहा॥ 8॥
शुद्ध भक्तों की चरण-रेणु भजन के अनुकूल है। भक्त-सेवा ही सर्वोच्च सिद्धि है व प्रेम-भक्ति लता का मूल है।(1) माधव तिथि (एकादशी तिथि) भक्ति की जननी है। इसे यत्न के साथ पालन करना चाहिए। इसमें निश्चित रूप से कृष्ण का वास है — ऐसा समझ कर इसका खूब आदर करना चाहिए। (2) मेरे गौरहरि जी ने जिन-जिन स्थानों पर आनन्द के साथ भ्रमण किया, उन सभी स्थानों का मैं प्रेमी-भक्तों के साथ दर्शन करूँगा। (3) मृदंग की ध्वनि को सुनने के लिए मेरा मन हमेशा लालायित रहता है तथा गौर-विहित कीर्तनों को सुनकर हृदय आनन्द से नाचने लगता है। (4) युगलमूर्ति देखकर मुझे बहुत आनन्द होता है। प्रसाद-सेवा करने से जन्म-मृत्यु का चक्कर खत्म हो जाता है। (5) जिस दिन घर में भजन होता देखता हूँ तो घर ही गोलोक लगने लगता है। (6) हरि-चरणों से निकली गंगा को देखकर तो आनन्द की सीमा ही नहीं रहती। तुलसी को माधव-तोषणी जानकर देखने से ही प्राण भर आते हैं। गौर-प्रिय शाक को सेवन करने में अपने जीवन को सार्थक समझता हूँ। (7) श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी कहते हैं कि मैं श्रीकृष्ण-भजन के अनुकूल जो-जो भी प्राप्त करता हूँ, प्रतिदिन उन सब को परम आनन्द के साथ स्वीकार करता हूँ। (8)
हरि हे!नीरधर्मगत’, जाह्नवी-सलिले, पंक फेन दृष्ट हय।तथापि कखन, ब्रह्मद्रव धर्म, से सलिल ना छाड़य॥ 1॥
वैष्णव-शरीर, अप्राकृत सदा, स्वभाव-वपुर धर्मे।कभु नहे जड़, तथापि ये निन्दे, पड़े से विषमाधर्मे॥ 2॥
सेइ अपराधे, यमेर यातना, पाय जीव अविरत।हे नन्दनन्दन, सेइ अपराधे, येन नाहि हइ हत ॥ 3॥
हे हरि! जल धर्म के कारण गंगा के पवित्र जल में भी कीचड़ व झाग दिखायी देता है तब भी वह जल गंगात्त्व धर्म (पवित्रता) को नहीं छोड़ता। (1)
इसी प्रकार वैष्णव शरीर हमेशा अप्राकृत होता है। स्वभाव व शरीर के धर्म के कारण वह कभी प्राकृत नहीं होता। इतना होने पर भी जो वैष्णवों की निन्दा करता है, वह भयंकर अधर्म में फंस जाता है। (2) इसी भयंकर अपराध के कारण जीव निरन्तर यम-यन्त्रणायें भोगता है। हे नन्दनन्दन! ऐसी कृपा कीजिए कि इन अपराधों के कारण जैसे मेरा पतन न हो। (3) आपके वैष्णव आपका वैभव हैं। हे हरि! मुझ पर करुणा करो। तभी उनके प्रति मेरी मति होगी और मैं आपकी पद छाया प्राप्त करूँगा। (4)