Bhajana Gīti
Kirtan

कि रूपे पाइव

Narottama Dāsa Ṭhākura1 min read
Guru TattvaBhakti
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कि रूपे पाइव सेवा मुइ दुराचार।श्रीगुरु-वैष्णवे रति ना हैल आमार॥
अशेष मायाते मन मगन हइल।वैष्णवेते लेश मात्र रति ना जन्मिल॥
विषये भुलिया अन्ध हैनु दिवानिशि।गले फाँस दिते फिरे माया से पिशाची॥
इहारे करिया जय छाड़ान ना याय।साधुकृपा बिना आर नाहिक उपाय॥
अदोषदरशि प्रभो पतित उद्धार।एइबार नरोत्तमे करह निस्तार॥

मैं दुराचारी भला कैसे आपकी सेवा प्राप्त कर सकता हूँ? श्रीगुरुदेव जी में व वैष्णवों में मेरी प्रीति नहीं हुई। अशेष माया में मेरा मन मग्न हो गया है। वैष्णवों में लेशमात्र भी अनुराग नहीं हुआ। मैं दिन-रात विषय भोगों में सब कुछ भूल कर अन्धा हुआ पड़ा हूँ और यह मायारूप पिशाची मेरे गले में फाँसी का फन्दा डालने के लिए डोल रही है। मैं इस माया को जय करके इससे छुटकारा नहीं पा सकता, साधु की कृपा के इलावा और कोई उपाय नहीं है, इससे बचने का। श्रीनरोत्तम ठाकुर जी कहते हैं कि हे अदोषदर्शी प्रभो! आप ही इस पतित का उद्घार कीजिये और इसी जन्म में मेरा निस्तार कर दीजिये।

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