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Kirtan

गुरुदेव ! दयामय

Śrīla Bhakti Kumud Santa Mahārāja4 min read
Guru TattvaKrishnaRadhaHarinamBhakti
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गुरुदेव! दयामय!प्राणेर यातना, जानाब कि तोमा, ह’येछे जीवन यन्त्रणामय॥ 1॥
श्रीकृष्णे भजिते नाहि चाहे मति, विषय-भोगेते प्रबला आसक्ति,विषयेर आशा नाहि छाड़े मन, विषयेते सदा धाय ॥ 2॥
कृष्ण दास्य भूलि’ मायारे भजिनु, आपन स्वरूप कभुना चिन्तिनु।विरूपे स्वरूप भावि मूढ़मन, मायाते आकृष्ट हय ॥ 3॥
दुष्ट-संगफल ना बुझिनु हाय, साधुकाछे येते चित्त नाहि चाय,असतेर संगे थाकिया सतत, चित्त ह’ल वज्र प्राय ॥ 4॥
कनक-कामिनी-लाभ-पूजा-आशा, चाहे मोर चित्त आर प्रतिष्ठाशा,किरूपे शोधित ह’वे मोर चित्त, एइ चिन्ता सदा हय ॥ 5॥
तव कृपाकण आमार सम्बल, तव कृपा बिना नाहि अन्य बल,कृपा कर प्रभु दिया चिद्बल, दास तोमा प्रणमय ॥ 6॥
साधु-संगे थाकि’ छय वेगदमि’, श्रीकृष्ण चरण सेवि येन आमि,हेन मति याचे तव दासाधम, वन्दि तव रांगा पाय ॥ 7॥
ओहे गुरुदेव! तव श्रीचरण, सेवि येन आमि जन्म-जन्म,एइ आशीर्वाद याचि’ अभाजन, तव पदे स्थान चाय ॥ 8॥

हे दयामय गुरुदेव! इन प्राणों को मिलने वाले कष्टों के बारे में मैं आपको क्या बताऊँ, मेरा तो सारा जीवन ही यन्त्रणामय हो गया है।(1)

श्रीकृष्ण-भजन करने के लिये ज़रा सा भी मन नहीं करता और दूसरी ओर विषय भोगों में मेरी प्रबल आसक्ति है। मेरा मन ऐसा हो गया है कि विषय-भोगों की आशा को परित्याग नहीं करता, हर समय विषयों की तरफ ही भागता रहता है।(2) मेरा जो अपना स्वरूप है उस ‘कृष्ण-दास्य’ स्वरूप को मैं भूल गया हूँ और माया का भजन कर रहा हूँ। अपने स्वरूप का मैंने कभी चिन्तन नहीं किया। जो मेरा स्वरूप नहीं है, उस विरूप को ही अपना स्वरूप समझ कर ये मूढ़ मन माया की तरफ आकृष्ट होता है।(3) दुष्टों की संगति का फल हाय! हाय! मेरी समझ में आया नहीं और अब साधु के पास जाने को भी चित्त नहीं चाहता। निरन्तर असत्-संग में रहने के कारण मेरा चित्त वज्र की तरह कठोर हो गया है।(4) मेरा चित्त कनक, कामिनी, लाभ, पूजा तथा प्रतिष्ठा की चाह करता है। हे गुरुदेव! मेरे इस चित्त का किस प्रकार से शोधन होगा, हर समय मुझे यही चिन्ता लगी रहती है।(5) आपकी कृपा का कण ही मेरा सहारा है। आपकी कृपा के बिना मेरा और कोई बल नहीं है। हे प्रभु! आप कृपा करके मुझे चिद्-बल प्रदान कीजिये। ये दास आपके शरणागत होता है।(6) साधु संग में रहूँ, छः प्रकार के वेगों का दमन कर सकूँ तथा श्रीकृष्ण के चरणों की जैसे मैं सेवा कर सकूँ—इस प्रकार की बुद्धि ये दासाधम चाहता है। इसलिए आपके अरुण-वर्ण चरणों की मैं वन्दना करता हूँ।(7) ओहे गुरुदेव! ये अभाजन (अपात्र) आपके श्रीचरणों में स्थान चाहता है तथा ये आशीर्वाद मांगता है कि आप मुझ पर ऐसी कृपा करो जैसे मैं जन्म-जन्मान्तर में आपके चरणों की सेवा करता रहूँ।(8)

गुरुदेवे, व्रजवने, व्रजभूमिवासी जने,शुद्ध भक्ते, आर विप्रगणे।इष्ट - मन्त्रे, हरिनामे, युगल-भजन-कामे,कर रति अपूर्व यतने॥ 1॥
धरि, मन, चरणे तोमार।जानियाछि एवे सार, कृष्णभक्ति बिना आर,नाहि घुचे जीवेर संसार॥ 2॥
कर्म, ज्ञान, तपः, योग, सकलइ त’ कर्मभोग,कर्म छाड़ाइते केह नारे।सकल छाड़िया भाइ, श्रद्धादेवीर गुण गाइ,याँ’र कृपा भक्ति दिते पारे॥ 3॥
छाड़ि’ दम्भ अनुक्षण, स्मर अष्टतत्त्व मन,कर ताहे निष्कपट रति।सेइ रति प्रार्थनाय, श्रीदास गोस्वामी पाय,ए भक्ति विनोद करे नति॥ 4॥

गुरुदेव, व्रज के द्वादश वन, व्रजवासी लोग, शुद्ध-भक्त, ब्राह्मण, इष्ट मन्त्र व हरिनाम तथा श्रीराधा-कृष्ण जी के युगल भजन की इच्छा में खूब यत्न के साथ प्रीति करो।(1)मैंने अपना मन आपके श्रीचरणों में सौंप दिया है। अब सार बात समझ में आयी कि श्रीकृष्ण भक्ति के बिना जीव का आवागमन रूप संसार-चक्कर कभी भी खत्म नहीं होता।(2)कर्म, ज्ञान, तपस्या तथा योग—ये सभी कर्मों के भोग भुगवायेंगे। कोई भी कर्म-चक्र से छुड़ा नहीं सकता। इसलिए भाई! सब छोड़कर तुम श्रद्धा देवी के गुणगान गाओ, जिनकी कृपा तुम्हें भक्ति दे सकती है।(3) अतः हर समय दम्भ का परित्याग करके अष्ट- तत्त्व* का स्मरण करो और उन्हीं में निष्कपट रूप से प्रीति करो। उसी प्रीति के लिये ही श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी जी के चरणों में

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