Bhajana Gīti
Kirtan

निताई गौरांग

Bhaktivinoda Ṭhākura2 min read
Guru TattvaKrishnaMahaprabhuNityanandaHarinamBhakti
PDF
निताई, गौरांग, अद्वैत, श्रीवास, गदाधर पंचजन।कृष्णनाम - रसे, भासाबे जगत्, करि महासंकीर्तन॥ 2॥
नर्तन-विलास, मृदंग - वादन, शुनिब आपन-काणे।देखिया देखिया, से लीला माधुरी, भासिब प्रेमेर वाने॥ 3॥
ना देखि आबार, से लीला-रतन, काँदि हा गौरांग! बलि।आमारे विषयी, पागल बलिया, अंगेते दिवेक धूलि॥ 4॥

गुरुदेव! आप कब अपनी करुणा प्रकाशित करेंगे। श्रीगौरांगलीला नित्य-तत्त्व है, ऐसा कब मुझे विश्वास होगा तथा कब हरि-हरि कहकर मैं गोद्रुम वन में उनके दर्शनों की आशा से भ्रमण करूँगा? (1)

हे गुरुदेव! मुझे कब ऐसा अनुभव होगा कि विशाल संकीर्तन के द्वारा श्रीमन् नित्यानन्द प्रभुजी, श्रीगौरांग महाप्रभुजी, श्रीअद्वैताचार्य जी, श्रीगदाधर जी तथा श्रीवास पण्डित जी —ये पांचों परमानन्दमय कृष्ण नाम रस में सारे जगत्-वासियों को डुबो रहे हैं। (2)

नर्तन-विलास, मृदंग-वादन मैं कब अपने कानों से सुनूँगा, कब मैंउस लीला माधुरी का बार-बार दर्शन करूँगा और प्रेम की बाढ़ में बहजाऊँगा। कुछ देर बार फिर उस लीला-रतन को न देखकर कब मैं हा गौरांग!बोलकर रोऊँगा। कब लोग मुझको विषयी, पागल समझकर मेरे ऊपर मिट्टीफैंकेंगे? (3-4)गुरुदेव!बड़ कृपा करि, गौड़वन माझे, गोद्रुमे* दियाछ स्थान।आज्ञा दिला मोरे, एइ व्रजे बसि, हरिनाम कर गान॥ 1॥
किन्तु कबे प्रभो, योग्यता अर्पिवे, ए दासेरे दया करि।चित्त स्थिर हवे, सकल सहिव, एकान्ते भजिव हरि॥ 2॥
शैशव-यौवने, जड़-सुख संगे, अभ्यास हइल मन्द।निजकर्म-दोषे, ए देह हइल, भजनेर प्रतिबन्ध॥ 3॥
वार्द्धक्ये एखन, पंचरोगे** हत, केमने भजिव बल।काँदिया काँदिया, तोमार चरणे, पड़ियाछि सुविह्वल॥ 4॥

गुरुदेव! आपने बहुत कृपा करके गौड़वन के बीच गोद्रुम* में मुझे स्थान दिया तथा मुझे आज्ञा दी कि इस व्रज में रह कर मैं हरिनाम कीर्तन करूँ।(1)

परन्तु हे प्रभु! कब आप दया करके इस दास को योग्यता अर्पण करेंगे जिससे मेरा चित्त स्थिर हो जाये, सब कुछ सहन करूँ व एकान्त भाव से हरिभजन कर सकूँ।(2)

बचपन व जवानी में दुनियावी भोगों में व्यस्त रहने के कारण मेरी आदतें खराब हो गयी हैं, मेरे अपने दोषों के कारण ये शरीर ही भजन का बाधक हो गया है, अब बुढ़ापा आ गया है व पंच रोगों** से ग्रसित हूँ। अब आप ही बताइये कि मैं कैसे भजन करूँ? मैं रोते-रोते आपके चरणों में विह्वल होकर पड़ा हूँ। (3-4) * नवद्वीप धाम के नौ द्वीपों में से एक द्वीप। ** पंचरोगः-अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश।

Continue the Journey