निताई गौरांग
गुरुदेव! आप कब अपनी करुणा प्रकाशित करेंगे। श्रीगौरांगलीला नित्य-तत्त्व है, ऐसा कब मुझे विश्वास होगा तथा कब हरि-हरि कहकर मैं गोद्रुम वन में उनके दर्शनों की आशा से भ्रमण करूँगा? (1)
हे गुरुदेव! मुझे कब ऐसा अनुभव होगा कि विशाल संकीर्तन के द्वारा श्रीमन् नित्यानन्द प्रभुजी, श्रीगौरांग महाप्रभुजी, श्रीअद्वैताचार्य जी, श्रीगदाधर जी तथा श्रीवास पण्डित जी —ये पांचों परमानन्दमय कृष्ण नाम रस में सारे जगत्-वासियों को डुबो रहे हैं। (2)
गुरुदेव! आपने बहुत कृपा करके गौड़वन के बीच गोद्रुम* में मुझे स्थान दिया तथा मुझे आज्ञा दी कि इस व्रज में रह कर मैं हरिनाम कीर्तन करूँ।(1)
परन्तु हे प्रभु! कब आप दया करके इस दास को योग्यता अर्पण करेंगे जिससे मेरा चित्त स्थिर हो जाये, सब कुछ सहन करूँ व एकान्त भाव से हरिभजन कर सकूँ।(2)
बचपन व जवानी में दुनियावी भोगों में व्यस्त रहने के कारण मेरी आदतें खराब हो गयी हैं, मेरे अपने दोषों के कारण ये शरीर ही भजन का बाधक हो गया है, अब बुढ़ापा आ गया है व पंच रोगों** से ग्रसित हूँ। अब आप ही बताइये कि मैं कैसे भजन करूँ? मैं रोते-रोते आपके चरणों में विह्वल होकर पड़ा हूँ। (3-4) * नवद्वीप धाम के नौ द्वीपों में से एक द्वीप। ** पंचरोगः-अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश।