Bhajana Gīti
Kirtan

श्रीगुरु-कृपा-प्रार्थना

Bhaktivinoda Ṭhākura2 min read
Guru TattvaKrishnaMahaprabhuHarinamBhakti
PDF
गुरुदेव!कृपाबिन्दु दिया, कर एइ दासे, तृणापेक्षा अति हीन।सकल-सहने, बल दिया कर, निज-माने स्पृहाहीन ॥ 1॥
सकले-सम्मान, करिते शकति, देह नाथ! यथायथ।तबे त’ गाइब, हरिनाम सुखे, अपराध ह’बे हत॥ 2॥
कबे हेन कृपा, लभिया ए जन, कृतार्थ हइबे, नाथ।शक्तिबुद्धि हीन, आमि अति दीन, कर मोरे आत्मसाथ॥ 3॥
योग्यता - विचारे, किछु नाहि पाइ, तोमार करुणा सार।करुणा न ह’ ले, काँदिया काँदिया, प्राण ना राखिब आर॥ 4॥

गुरुदेव, आप तो कृपा के सागर हैं, आप अपनी कृपा का एक बिन्दु देकर इस दास को तृण से भी अधिक दीन बना दीजिए। मुझे सब कुछ सहन करने की ताकत दीजिये व ऐसा कर दीजिये जैसे मैं अपने सम्मान के लिये स्पृहाहीन हो सकूँ।(1)

हे नाथ, मुझे शक्ति दीजिये ताकि मैं सभी का यथायोग्य सम्मान कर सकूँ। तब ही तो सुखपूर्वक हरिनाम गान कर पाऊँगा व मेरे अपराध खत्म हो जायेंगे।(2)

हे नाथ, कब ऐसी कृपा प्राप्त करके मैं कृतार्थ होऊँगा। मैं शक्ति बुद्धिहीन हूँ, अति दीन हूँ , कृपा करके मुझे आत्मसात् कीजिये।(3)

मैंने अपनी योग्यता विचार करके देखा तो कुछ भी नहीं पाया, अतः आपकी करुणा ही मेरा सर्वस्व है। यदि करुणा नहीं होगी तो मैं रो-रोकर अपने प्राणों को और धारण नहीं करूँगा अर्थात रो-रोकर मर जाऊँगा।(4)

गुरुदेव!कबे मोर सेइ दिन हबे?मन स्थिर करि, निर्जने बसिया, कृष्णनाम गाव यबे।संसार-फुकार, काणे ना पशिबे, देह-रोग दूरे रबे॥ 1॥
‘हरे कृष्ण’ बलि, गाहिते गाहिते, नयने बहिवे लोर।देहेते पुलक, उदित हइबे, प्रेमेते करिबे भोर॥ 2॥
गद-गद वाणी, मुखे बाहिरिबे, काँपिबे शरीर मम।घर्म मुहुर्मुहुः, विवर्ण हइबे, स्तम्भित प्रलय सम॥ 3॥
निष्कपटे हेन, दशा कबे हबे, निरन्तर नाम गा’व।आवेशे रहिया, देहयात्रा करि, तोमार करुणा पा’व॥ 4॥

गुरुदेव! कब मेरा वह दिन होगा जब मैं अपने मन को स्थिर करके एकान्त में बैठकर कृष्ण नाम गाऊँगा, संसार की आवाज़ मेरे कान में नहीं घुसेगी और मेरे देह रोग दूर रहेंगे।(1)

‘हरे कृष्ण’ कीर्तन गाते-गाते मेरी आँखों में आसुँओं की धारायें बहेंगी, शरीर पुलकित होगा और मुझे प्रेम में मस्त कर देगा।(2)

मुख से गदगद् वाणी निकलेगी और मेरा शरीर कम्पित होगा।शरीर से बार-बार पसीना निकलेगा व शरीर का रंग भी बदल सा जाएगा औरकभी-कभी मृत शरीर की तरह निःश्चेष्ट हो जायेगा। मेरी इस प्रकार की दशाकब होगी, जब मैं निष्कपट रूप से निरन्तर कृष्ण नाम गाऊँगा। भजन केआवेश में रहकर किसी प्रकार ये देहयात्रा करूँगा तथा आपकी करुणा प्राप्तकरूँगा? (3-4)गुरुदेव!कबे तव करुणा प्रकाशे।श्रीगौरांग लीला, हय नित्यतत्त्व, एइ दृढ़ विश्वासे।‘हरि हरि’ बलि, गोद्रुम कानने, भ्रमिव दर्शन-आशे॥ 1॥

Continue the Journey