Bhajana Gīti
Kirtan

श्रीगुरुचरण पद्म (श्रीगुरु-महिमा)

Narottama Dāsa Ṭhākura2 min read
Guru TattvaKrishnaBhakti
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श्रीगुरुचरणपद्म,केवल भक्तिसद्म,वन्दों मुञि सावधान मते।याँहार प्रसादे भाई,ए भव तरिया याइ,कृष्ण प्राप्ति हय याँहा ह’ते॥1॥
गुरुमुखपद्मवाक्य,चित्तेते करिया ऐक्य,आर ना करिह मने आशा।श्रीगुरुचरणे रति,एइ से उत्तम गति,ये प्रसादे पूरे सर्व आशा॥ 2॥
चक्षुदान दिला येइ,जन्मे-जन्मे प्रभु सेइ,दिव्यज्ञान हृदे प्रकाशित।प्रेमभक्ति याँहा हैते,अविद्या-विनाश याते,वेदे गाय याँहार चरित ॥ 3॥
श्रीगुरु करुणासिन्धु,अधम जनार बन्धु,लोकनाथ लोकेर जीवन।हा हा प्रभो! कर दया,देह मोरे पदछाया,एबे यश घुषुक त्रिभुवन ॥ 4॥

श्रीनरोत्तम दास ठाकुर महाशय जी कहते हैं कि श्रीगुरुदेव जी के चरण कमल शुद्ध-भक्ति की खान हैं, अतः मैं सावधानीपूर्वक उनकी वन्दना करता हूँ। इन चरणों की कृपा से भव-सागर से पार हुआ जाता है तथा इन्हीं की कृपा से श्रीकृष्ण की प्राप्ति होती है। गुरुदेव जी के मुखारविन्द से निःसृत वाक्यों को एक चित्त से धारण करना, इसके इलावा और कोई भी आशा या इच्छा मन में मत रखना। गुरुदेव जी के चरणों में यदि प्रीति हो जाये तो उत्तम गति प्राप्त होती है तथा इन श्रीचरणों की कृपा से जितनी भी आशायें हैं, वे सब पूर्ण हो जाती हैं। दिव्य नेत्र जिन्होंने प्रदान किये हैं, वे ही मेरे जन्म-जन्म के प्रभु हैं। उन्हीं की कृपा से ही हृदय में दिव्य ज्ञान प्रकाशित होता है। इन्हीं से प्रेम-भक्ति की प्राप्ति होती है व अविद्या का विनाश होता है। वेद भी इनकी महिमा बखान करते हैं। श्रीगुरुदेव करुणा के सागर हैं, अधम जनों के बन्धु हैं तथा मेरे गुरुदेव श्रीलोकनाथ जी तमाम मनुष्यों के जीवन स्वरूप हैं। हा! हा!! प्रभु!! मुझ पर दया कीजिये। मुझे अपने पादपद्मों की छाया प्रदान कीजिये ताकि इनका (अर्थात् इन पादपद्मों का) यश सारे त्रिभुवन में फ ैल जाये।

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