संसाररूप दावालन से सन्तप्त जनमात्र की रक्षा करने के लिये, दया के भाव से बरसालु-मेघ के भाव को प्राप्त होनेवाले, एवं कल्याण-गुणों के भण्डार स्वरूप श्रीगुरुदेव के शोभायमान चरणारविन्द की मैं वन्दना करता हूँ। (1)
महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्यदेव जी के नामसंकीर्तन, नृत्य, एवं गाने-बजाने से प्रेमोन्मत्त मानसिक-रस के द्वारा उत्पन्न रोमांच, कम्प, अश्रु आदिकों की तरंगों का सेवन करने वाले श्रीगुरुदेव के शोभायमान चरणारविन्द की मैं वन्दना करता हूँ। (2)
अपने इष्टदेव श्रीराधाकृष्ण जी के श्रीविग्रह का आराधन, एवं नित्यप्रति अनेकप्रकार का श्रृंगार करना, एवं उनके मन्दिर को झाड़ना, बुहारना, धोना आदि कीसेवा में स्वयं लगे रहनेवाले, तथा अधिकारी भक्तों को पूर्वोक्त सेवाओं मेंनियुक्त करनेवाले श्रीगुरुदेव के शोभायमान चरणारविन्द की मैं वन्दना करताहूँ। (3) श्रीकृष्णभक्तवृन्दों को चर्व्य-चोष्य-लेह्य-पेय— इन चारों प्रकार केश्रीभगवत्प्रसादमय सुस्वादु अन्न के द्वारा सदैव परितृप्त करके, स्वयं तृप्त होनेवाले श्रीगुरुदेव के शोभायमान चरणारविन्द की मैं वन्दना करता हूँ।(4) अपनेइष्टदेव श्रीराधाकृष्ण के अपार माधुर्य, अपार लीलाएँ, अपार गुण, अपार रूप,एवं अनन्त नामावलियों के प्रतिक्षण आस्वादन करने में लालायित रहनेवालेनिकुन्जयूनो रतिकेलिसिद्ध्यै, या यालिभिर्युक्तिरपेक्षणीया।तत्रातिदाक्षादतिवल्लभस्य, वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम्॥ 6॥
श्रीगुरुदेव के शोभायमान चरणारविन्द की मैं वन्दना करता हूँ।(5) निकुञ्जविहार- परायण श्रीराधाकृष्णरूप-युवक, युगलजोड़ी की रमणक्रीड़ा की सिद्धि के लिये, श्रीललिता-विशाखा आदि सखियों के द्वारा जो जो युक्ति अपेक्षित है, उस युक्ति में अनन्त-चातुर्य के कारण अपने इष्टदेव के अतिशय प्यारे श्रीगुरुदेव के शोभायमान चरणारविन्द की मैं वन्दना करता हूँ। (6) श्रीगुरुदेव का स्वरूप समस्त शास्त्रों के द्वारा साक्षात् श्रीहरि का स्वरूप ही बतलाया जाता है, तथा सज्जनों के द्वारा अनुभव में भी उसी प्रकार से लाया जाता है, किन्तु जो अपने प्रभु के अतिशय प्यारे हैं, उन्हीं श्रीगुरुदेव के शोभायमान चरणारविन्दकी मैं वन्दना करता हूँ। (7) जिनकी प्रसन्नता से ही भगवान् की प्रसन्नता होती है, एवं जिनकी अप्रसन्नता से कहीं भी सद्गति नहीं होती है, उन्हीं श्रीगुरुदेव का तीनों सन्ध्याओं में ध्यान करता हुआ, एवं उनके यश की स्तुति करता हुआ, मैं, पूर्वोक्त गुणगणविशिष्ट उन्हीं श्रीगुरुदेव के शोभायमान चरणारविन्द की वन्दना करता हूँ।(8) जो व्यक्ति ब्रह्म-मुहुर्त में इस श्रीगुरुदेवाष्टक को प्रयत्नपूर्वक ऊँचे स्वर से ताल-लयपूर्वक पढ़ता है, वह व्यक्ति अपने देहावसान के बाद वृन्दावनाधीश्वर नन्दनन्दन भगवान श्रीकृष्ण की साक्षात् सेवा को प्राप्त कर लेता है। (9)