श्रीगुरु-परम्परा
श्रीमद् भगवद् गीता इत्यादि ग्रन्थों के अनुसार भगवद्-ज्ञान गुरु-परम्परा में आता है। प्रस्तुत गीति में हमारे श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ की गुरु-परम्परा दी गयी है, जिसका प्रारम्भ नित्य-ज्ञान और आनन्द के पूर्ण-विग्रह, तमाम कारणों के कारण, नन्दनन्दन, भगवान श्रीकृष्ण से हुआ है। स्मरण रहे कि जीव जब से उत्पन्न हुआ है, यह वैष्णव धर्म भी उसी समय से प्रकट हुआ है। चूँकि जीव का किसी जड़ीय काल में प्रारम्भ नहीं है, इसलिए जीव अनादि है और ये धर्म, जिसे जैव-धर्म या वैष्णव धर्म क हते हैं, वह भी अनादि है। वैसे तो अनादि काल से चल रही इस सनातन गुरु-परम्परा में अनगिनत आचार्य हुए हैं परन्तु गुरु-परम्परा की निर्देशिका स्वरूप इस गीति में तो मुख्य-मुख्य आचार्यों के ही नाम दिये गये हैं। भगवान श्रीकृष्ण ही मूल जगद्गुरु हैं, उन्होंने अपने तत्व का ज्ञान सबसे पहले सृष्टि के प्रथम जीव, चतुर्मुख ब्रह्मा जी को दिया, जिस ज्ञान को प्राप्त करके ब्रह्मा जी भगवान श्रीकृष्ण की सेवा में निमग्र हो गये। ब्रह्मा जी की कृपा से ऐसी भगवद्-भक्तिमयी मति फिर श्री नारद जी की हुई। गोस्वामी नारद जी से ये ज्ञान जगद्गुरु श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यास जी को हुआ। गुरु-परम्परा में चलते हुए यह ज्ञान हमारे इस कलियुग में हुए चार प्रमुख वैष्णव-आचार्यों में से एक श्रीमध्वाचार्य जी को मिला। वे अपने आप को जगद्गुरु श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यास जी का दास कहते हैं। इसी प्रकार ये ज्ञान गुरु-परम्परा में श्रीपूर्णप्रज्ञ जी, श्रीपद्मनाभ जी, श्रीनरहरि जी, श्रीमाधव जी तथा श्रीअक्षोभ्य जी के पास आया। श्रीअक्षोभ्य जी के शिष्य, श्रीजयतीर्थ जी के नाम से परिचित हुए। इन्हीं श्रीजयतीर्थ जी की कृपा से श्रीज्ञानसिन्धु जी का उद्घार हुआ। श्रीज्ञानसिन्धु जी से श्रीदयानिधि जी को ज्ञान मिला। फिर श्रीदयानिधि जी से ये दिव्य ज्ञान उनके सेवक श्रीविद्यानिधि जी को तथा इनसे ज्ञान मिला श्रीराजेन्द्र जी को। श्रीराजेन्द्र जी के सेवक, जो कि श्री जय धर्म जी के नाम से पहचाने जाते थे, उन्हें अपने गुरु श्रीराजेन्द्र जी से दिव्य ज्ञान मिला था। भगवद् ज्ञान की इस परम्परा को भलीभाँति समझ लेना चाहिए। आगे श्रीजयधर्म जी के सेवक के रूप में प्रसिद्ध हुए — श्री पुरुषोत्तम तीर्थ जी। इन्हीं श्रीपुरुषोत्तम तीर्थ जी से ज्ञान मिला श्रीब्रह्मण्य तीर्थ जी को। इसके बाद ये ज्ञान श्रीव्यास तीर्थ जी से श्रीलक्ष्मीपति जी को मिला तथा इन्हीं के शिष्य थे — श्रीमाधवेन्द्र पुरीपाद जी। श्रीमाधवेन्द्र पुरीपाद जी के विशेष कृपा पात्र हुए — श्रीईश्वर पुरी जी, श्रीनित्यानन्द प्रभु जी तथा श्रीअद्वैताचार्य प्रभु जी। श्रीईश्वर पुरी पाद जी वे महान भाग्यशाली भगवद् पार्षद हैं जिनका जगद्गुरु श्रीम्न चैतन्य महाप्रभु जी ने चरणाश्रय ग्रहण करके उन्हें धन्य-धन्य कर दिया। स्मरण रहे कि श्रीम्न चैतन्य महाप्रभु कोई साधारण या असाधारण आचार्य नहीं हैं, वे तो श्रीमती राधा जी एवं भगवान श्रीकृष्ण जी के सम्मिलित स्वरूप हैं तथा गौड़ीय-जगत के पथ-प्रदर्शक श्रीरूपगोस्वामी जी के अनुगत जनों के जीवन-स्वरूप हैं। महाप्रभु विश्वंभर जी के प्रिय पार्षदों में मुख्य हैं — श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीरूप गोस्वामी तथा श्रीसनातन गोस्वामी। श्रीजीव गोस्वामी तथा श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी जी ने इन्हीं श्रीरूप गोस्वामी जी का चरणाश्रय ग्रहण किया था। इनके प्रिय भक्त हुए हैं — श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी जी। श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी जी के प्रियतम व सर्वोत्तम सेवा-परायण भक्त थे श्रीनरोत्तम ठाकुर तथा इनके अनुगत भक्त थे श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर। श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी के विशेष घनिष्ठ थे — श्रीबलदेव विद्याभूषण जी, इनके प्रिय थे — वैष्णव सार्वभौम श्रीजगन्नाथ दास बाबाजी महाराज तथा इनके प्रिय हुए हैं, श्रील भक्ति विनोद ठाकुर। श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी के प्रिय हुए हैं — महाभागवत श्रील गौरकिशोर दास बाबाजी महाराज, जोकि हर समय परमानन्द के साथ एकान्त निर्जन भजन करते रहते थे। श्रीवार्षभानवी दयित दास अर्थात जगद्गुरु श्री श्रीमद् भक्ति सिद्धांत सरस्वती गोस्वामी ठाकुर ‘प्रभुपाद’ जी इन्हीं श्रीगौरकिशोर दास बाबाजी महाराज जी के विशेष कृपा पात्र थे। इन ‘प्रभुपाद’ जी के परम प्रिय हुए हैं त्रिदण्डिस्वामी श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी, जो कि रूपानुग जनों में श्रेष्ठ थे तथा तमाम गुणों की खान थे। इनकी अपने गुरु-भाईयों के प्रति व सज्जन स्वभाव के व्यक्तियों से प्रीति एक आदर्श थी तथा जो लोग भगवान के विमुख, दीन-हीन व्यक्ति होते थे उनके आध्यात्मिक जीवन के आधार तो आप ही होते थे। ऊपर कही गुरु-परम्परा के सभी आचार्य भगवान श्रीगौरहरि जी के निज-जन हैं व प्रिय-परिकर हैं। हम सब उन्हीं के उच्छिष्ट की (जूठन प्राप्त करने की) अर्थात् कृपा प्राप्त करने की कामना करते हैं।