भूमिर्यत्र सुकोमला बहुविधप्रद्योतिरत्नच्छटा,नानाचित्र मनोहरं खगमृगाद्याश्चर्यरागान्वितम्।बल्लीभूरुहजातयोऽद्भुततमा यत्र प्रसूनादिभि-स्तन्मे गौरकिशोर-केलि-भवनः मायापुरं जीवनम्॥ 29॥
जहाँ की भूमि सुकोमल है, जो कि विभिन्न प्रकार के रत्नों के प्रकाश से झलमल-झलमल करती रहती है, जहाँ के दृश्य बड़े ही मनोहर हैं, जहाँ के पक्षी व हिरण आदि पशु भी आश्चर्यमय दिव्य राग अलापते रहते हैं। जहाँ के वृक्ष व लतायें अपने दिव्य फलों और फूलों से हर समय सुसज्जित रहती हैं, ऐसे मायापुर धाम को मैं प्रणाम करता हूँ।(29)