दुर्जन संग कबहूँ नहिं कीजै।दुर्जन - मिलन सदा दुखदाई, तिनसों पृथक रहीजै॥ 1॥
दुर्जन की मीठी बानी सुनि, तनिक प्रतीति न कीजै।छाड़िय विष सम ताहि निरन्तर, मनहिं थान जनि दीजै॥ 2॥
दुर्जन संग कुमति अति उपजै, हरि मारग मति छीजै।छूटै प्रेम - भजन श्रीहरि को, मन विषयन में भीजै॥ 3॥
जिनसे सकल शान्ति सुख मन के, सिर धुनि-धुनिकर मीजै।मन अस दुर्जन दुखनिधि परिहरि, सत-संगत रति कीजै॥ 4॥
नित नहाने हरि मिलें, तो जल जन्तु होइ।फल, मूल खाकर हरि मिलें, तो बहुत बादुर बदराइ॥ 1॥
तृण खाकर हरि मिलें, तो बहुत मृगी अजा।स्त्री छोड़कर हरि मिलें, तो बहुत रहे हैं खोजा॥ 2॥
दूध पीकर हरि मिलें, तो बहु वत्स बाला।मीरा कहे बिना प्रेम से, नहिं मिले नन्दलाला॥ 3॥