मो सम कौन कुटिल खल कामी।जिन तनु दियो ताहि विसरायो, ऐसौ नमक - हरामी॥ 1॥
भरि भरि उदर विषय को धायो, जैसे सूकर-ग्रामी।हरिजन छाँड़ि हरि विमुखन की, निशि-दिन करत गुलामी॥ 2॥
पापी कौन बड़ो जग मोते सब पतितन में नामी।सूर पतित को ठौर कहाँ है, तुम बिन श्रीपति स्वामी॥ 3॥
भजो रे मन, कृष्ण-नाम सुखदाई।कृष्ण-नाम के दो अक्षर में, सब सुख शान्ति समाई॥ 1॥
कृष्ण - नाम लेत मुख से, भवसागर तर जाई।कृष्ण-नाम भजले मन मूरख, बनत बनत बन जाई॥ 2॥
कृष्ण-नाम के कारण बन गई, पागल मीराबाई।गणिका गिद्ध अजामिल तारे, तारे सदन कसाई॥ 3॥
जूठे बेरन में शबरी के, भर गई कौन मिठाई।मीठे समझ के ना प्रभु खाये, प्रेम की थी अधिकाई॥ 4॥
छाँड़ि मन, हरि-विमुखन को संग।जिनके संग कुबुद्धि उपजत है, परत भजन में भंग॥
कहा होत पय पान कराये, विष नहिं तजत भुजंग।कागहि कहा कपूर चुगाये, स्वान न्हवाये गंग॥
खर को कहा अरगजा-लेपन, मरकट भूषण अंग।गज को कहा न्हवाय सरितन, बहुरि धरै खहि छंग॥
पाहन पतित बाँस नहीं बेधत, रीतो करत निषंग।सूरदास खल कारी कामरि, चढ़त न दूजो रंग॥