हे गोविन्द राखो शरण अब तो जीवन हारे।नीर पीवन हेतु गयो सिन्धु के किनारे।सिन्धु बीच बसत ग्राह चरण धरि पछारे॥ 1॥
चार प्रहर युद्ध भयो ले गयो मझधारे।नाक कान डुबन लागे कृष्ण को पुकारे॥ 2॥
द्वारिका में शब्द भयो शोर भयो भारे।शंख, चक्र, गदा, पद्म, गरुड़ ले पधारे॥ 3॥
सूर कहे श्याम सुनो शरण मैं तिहारे।अब की बेर पार करो हे नन्द के दुलारे॥ 4॥
सोई रसना जो हरिगुन गावै।नैनन की छबि यहै चतुरता, जो मुकुन्द-मकरन्दहि ध्यावै॥ 1॥
निर्मल चित्त तौ सोई साँचो, कृष्ण बिना जिय और न भावै।श्रवनन की जु यहै अधिकाई, सुनि हरि-कथा सुधा-रस पावै॥ 2॥
कर तेई जे स्यामहि सेवैं, चरननि चलि वृन्दावन जावै।सूरदास जैये बलि ताके, जो हरि जू सों प्रीति बढ़ावै॥ 3॥