आलि! म्हाँने लागे वृन्दावन नीको।घर घर तुलसी ठाकुर पूजा, दरसन गोविन्द जी को॥ 1॥
आली! म्हाँने लागे वृन्दावन नीको।निरमल नीर बहत जमुना में, भोजन दूध दही को।रतन-सिंहासन आप बिराजै, मुकट धरयो तुलसी को॥ 2॥
आली! म्हाँने लागे वृन्दावन नीको।कुन्जन कुन्जन फिरत राधिका, सबद सुणत मुरली को।मीरा के प्रभु गिरधर नागर, भजन बिना नर फीको॥ 3॥
अब मैं शरण तिहारी जी, मोहे राखो कृपानिधान।अजामिल अपराधी तारे, तारे नीच सदान।जल डूबत गजराज उबारे, गणिका चढ़ी विमान॥
और अधम तारे बहुतेरे, भाखत सन्त - सुजान।कुब्जा नीच भीलनी तारी, जाने सकल जहान॥
कहँ लग कहूं गिणत नहिं आवे, थकि रहे वेद-पुराण।मीरा दासी शरण तिहारी, सुनिये दोनों कान॥