ओ मन! प्रेम से भजो श्यामराय।प्रेम बिना जँही कछु नहीं भावे॥
मोहन मूर्ति झलकत जँही, मुरली बजावत गोपी मन मोही। मोरमुकुट सिरभूषण सोही॥ प्रेम ........... गोवर्धनधारी कुन्जबिहारी, राधावल्लभ ब्रज हितकारी। व्रजवासिन के प्रेमभिखारी॥ प्रेम ........... कौन जानत सो प्रेम की ओर, आप विमोहित राधा मन चोर। करुणा बिना नहीं दीखत ठौर॥ प्रेम ...........