हरि मैं दास तुम्हारो।मुझे न अपने दिल से बिसारो॥
मैं दास तुम्हारो-----भव जलधारा दुस्तरपारा।डूब रहा हूँ पार उतारो॥
परम कृपाला, दीन दयाला।करुणा करी निज नैन निहारो॥
मैं दास तुम्हारो----क्षमा कीजिये, निज-सेवा दीजिये।मेरे अवगुण लाख हज़ारों॥
पतित का बन्धु तू है, मैं चरणों का चेरो।दीनजनन भवबन्ध निवारो, मैं दास तुम्हारो॥
व्रज-जन मनसुखकारी।राधे-श्याम श्यामा-श्याम॥
मोर मुकुट मकराकृत कुण्डल, गल वैजयन्तीमाल। चरणन नूपुर रसाल, राधे........ सुन्दर वदन कमलदल लोचन, बाँकी चितवनहारी। मोहन वंशी विहारी। राधे ......... वृन्दावन में धेनु चरावे, गोपीजन मनहारी। श्रीगोवर्धनधारी। राधे .......... राधा-कृष्ण मिलि अब दोऊ, गौर रूप अवतारी। कीर्तन धर्म प्रचारी। राधे ....... तुम बिन मेरे और न कोई, नामरूप अवतारी। चरणन में बलिहारी। राधे ........