और कौन है ऐसा प्रभु दयालु महान।प्रेमदाता शिरोमणि पतितपावन॥ 1॥गोलोकधाम में बैठत जो है।भक्तों के चित्तहारीनदीया में अब प्रकटे सो है।अपने प्रेम-भिखारी॥ 2॥भाव-मग्न सदा नाचत रंगे।नाम अनुक्षण भक्तों के संगेभ्रमत गौरहरि प्रेम तरंगे।देखत जग जन पुलकित अंगे॥ 3॥पापी-तापी-नीच छोड़त नांहि।व्रज-प्रेम बांटत देखत जो हीराधा माधव जू का देहो प्रसाद।श्रीचैतन्य गोसाईं ॥ 4॥