आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु मा-मदर्शनान्मर्महतां करोतु वा।यथा तथा व विदधातु लम्पटो, मत्प्राणनाथस्तु स एव नाऽपरः॥ 8॥
वह लंपट अपनी पादसेवा में आसक्त, मुझ दासी को प्रगाढ़ आलिंगन से भींचे, किंवा अपने दर्शन न देकर, मुझे मर्माहत करते हुए पीड़ा भी पहुँचाये, या अपनी जो अभिरुचि हो सो करे, परन्तु वही मेरा प्राणनाथ है। उनके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है।(8)
आमि कृष्णपद-दासी,तें हो रससुखराशि,आलिंगिया करे आत्मसाथ।किबा ना देय दरशन,ना जाने मोर तनुमन,तबु तेँ हो मोर प्राणनाथ॥
तावुत्कौ लब्धसंगौ बहुपरिचरणैर्वृन्दयाराध्यमानौ,प्रेष्ठालीभिर्लसन्तौ विपिनविहरणैर्गानरासादिलास्यः।नानालीलानितान्तौ प्रणयिसहचरीवृन्दसंसेव्यमानौ,राधाकृष्णौ निशायां सुकु सुमशयने प्राप्तनिद्रौ स्मरामि॥ 8॥
मैं, उन श्रीराधाकृष्ण का स्मरण करता हूँ कि, जो दोनों, रात्रि में पहलेपरस्पर मिलने के लिए उत्कण्ठित हो रहे हैं। पश्चात् जिनको परस्पर मिलन प्राप्तहो गया है, एवं वृन्दादेवी के द्वारा अनेक प्रकार की सेवाओं से जिनकी आराधनाहो रही है। पश्चात् अपनी प्रियसखियों के सहित वनविहार, गायन, रासलीलाआदि में किये गये नृत्यों से जो सुशोभित हो रहे हैं, तथा अनेक लीलाओं सेपरिश्रान्त होकर, जो प्रेमभरी सहचरीश्रेणी के द्वारा व्यंजन, शीतलजल, तांबूल,एवं पादसंवाहन आदि के द्वारा सेवित हो रहे हैं, पश्चात् मनोहर पुष्प-शैया परजो शयन कर रहे हैं।वृन्दा परिचर्या पाञा,प्रेष्ठालिगणेरे लञा,राधाकृष्ण रासादिक लीला।गीतलास्य कैल कत,सेवा कैल सखी यत,कुसुमशय्याय दुँहे शुइला॥
निशाभागे निद्रा गेल,सबे आनन्दित हैल,सखीगण परानन्दे भासे।ए सुख-शयन स्मरि,भज मन राधा-हरि,सेइ लीला प्रवेशेर आशे॥