युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम्।शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्दविरहेण मे॥ 7॥
हे सखि! गोविन्द के विरह से, मेरा निमेषमात्र काल भी युग के समान प्रतीत होता है, मेरी आँखों ने वर्षाऋतु का सा रूप धारण कर लिया है, और यह समस्त जगत् मुझे शून्य सा प्रतीत होता है।(7)
उद्वेगे दिवस ना याय, ‘क्षण’ हइल ‘युग’-सम।वर्षार मेघप्राय अश्रु वरिषे नयन॥
गोविन्द - विरहे शून्य हैल त्रिभुवन।तुषानले पोड़े येन ना याय जीवन॥
गाइते गाइते नाम कि दशा हइल।‘कृष्ण नित्यदास मुञि’ हृदये स्फुरिल॥ 1॥
जानिलाम, मायापाशे ए जड़ - जगते।गोविन्द - विरहे दुःख पाइ नाना मते॥ 2॥
आर ये संसार मोर नाहि लागे भाल।काँहा याइ, कृष्ण हेरि - ए चिन्ता विशाल॥ 3॥
काँदिते काँदिते मोर आँखि बरिषय।वर्षाधारा हेन चक्षे हइल उदय ॥ 4॥
निमेष हइल मोर शतयुग सम।गोविन्द विरह आर सहिते अक्षम॥ 5॥
शून्य धरातल, चौदिके देखिये, पराण उदास हय।कि करि, कि करि, स्थिर नाहि हय, जीवन नाहिक रय॥ 6॥
व्रजवासिगण, मोर प्राण राख, देखाओ श्रीराधानाथे।भकतिविनोद, मिनति मानिया, लओ हे ताहारे साथे॥ 7॥
श्रीकृष्ण-विरह आर सहिते ना पारि।पराण छाड़िते आर दिन दुइ चारि॥ 1॥
गाइते ‘गोविन्द’-नाम उपजिल भावग्राम,देखिलाम यमुनार कूले।वृषभानुसुता-संगे, श्याम नटवर रंगे,बाँशरी बाजाय नीपमूले॥ 2॥
देखिया युगल-धन, अस्थिर हइल मन,ज्ञानहारा हइलुँ तखन।कतक्षणे नाहि जानि, ज्ञान-लाभ हइल मानि,आर नाहि भेल दर्शन॥ 3॥
सखि गो! केमते धरिब पराण।निमेष हइल युगेर समान॥ 4॥
श्रावणेर धारा, आँखि बरिषय, शून्य भेल धरातल।गोविन्द-विरहे, प्राण नाहि रहे, केमने बाँचिब बल॥ 5॥
भकतिविनोद, अस्थिर हइया, पुनः नामाश्रय करि’।डाके, राधानाथ! दिया दर्शन, प्राण राख, नहे मरि॥ 6॥
राधां सालीगणां तामसित-सित-निशायोग्यवेशां प्रदोषे,दूत्या वृन्दोपदेशादभिसृत-यमुनातीर-कल्पागकुञ्जाम्।कृष्णं गोपैः सभायां विहितगुणिकलालोकनं स्निग्धमात्रा,यत्नादानीय संशायितमथ निभृतं प्राप्तकुञ्जं स्मरामि॥
मैं, सखियों के सहित उन श्रीमती राधिका का स्मरण करता हूँ कि,जिन्होंने प्रदोषकाल में, कृष्णपक्ष एवं शुक्लपक्ष की रात्रियों में धारण करनेयोग्य वेष को धारण किया है, एवं वृन्दादेवी के उपदेश से जिन्होंने अपनीअंतरंग-दूती के साथ, यमुनातीरस्थ कल्पवृक्ष की निकुञ्ज में अभिसरण कियाहै। एवं मैं, उन श्रीकृष्ण का स्मरण करता हूँ कि, जिन्होंने श्रीनन्दजी की सभामें, समस्त गोपों के सहित, गुणीजनों के द्वारा दिखाई गई, अनेक कलाओं काअवलोकन किया है। पश्चात् स्नेहमयी माता के द्वारा, सभा से यत्नपूर्वक बुलवाकर, दुग्धपान करा कर, जिनका शयन कराया गया है। पश्चात् जो गुप्तरूप सेसंकेतकुञ्ज में पहुँच जाते हैं॥
राधा वृन्दा उपदेशे,यमुनोपकुलदेशे,सांकेतिक कुञ्जे अभिसरे।सितासित निशायोग्य,धरि वेश कृष्णभोग्य,सखीसंगे सानन्द अन्तरे॥
गोपसभा माझे हरि,नानागुणकला हेरि,मातृयत्ने करिल शयन।राधासंग सोङरिया,निभृते बाहिर हइया,प्राप्तकुञ्ज करिये स्मरण॥