नयनं गलदश्रु - धारया वदनं गद्गदरुद्धया गिरा।पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नामग्रहणे भविष्यति? ॥ 6॥
हे प्रभो! आपका नाम ग्रहण करते समय, मेरे नयन अश्रुधारा से, मेरा मुख गद्गद वाणी से, और मेरा शरीर पुलकावलियों से कब व्याप्त होगा? (6)
प्रेमधन बिना व्यर्थ दरिद्र जीवन।‘दास’ करि’ वेतन मोरे देह’ प्रेमधन॥
अपराध-फले मम,चित्त-भेल वज्रसम,तुया नामे ना लभे विकार।हताश हइये हरि,तब नाम उच्च करि,बड़ दुःखे डाकि बार-बार॥ 1॥
दीन दयामय करुणा-निदान।भावबिन्दु देइ राखह पराण॥ 2॥
कबे तव नाम-उच्चारणे मोर।नयने झरब दरदर लोर॥ 3॥
गदगद स्वर कण्ठे उपजब।मुखे बोल आध आध बाहिराब॥ 4॥
पुलके भरब शरीर हामार।स्वेद-कम्प-स्तंभ हबे बारबार॥ 5॥
विवर्ण शरीरे हाराओबु ज्ञान।नाम - समाश्रये धरबुँ पराण॥ 6॥
मिलब हामार किये ऐछे दिन।रोओये भक्तिविनोद मतिहीन॥ 7॥
सायं राधां स्वसख्या निजरमणकृते प्रेषितानेकभोज्याँ,सख्यानीतेश-शेषाशन-मुदितहृदां तां च तं च ब्रजेन्दुम्।सुस्नातं रम्यवेशं गृहमनु जननीलालितं प्राप्तगोष्ठं,निर्व्यूढोऽस्त्रालिदोहं स्वगृहमनु पुनर्भुक्तवन्तं स्मरामि॥ 6॥
मैं, उन श्रीमती राधिका का स्मरण करता हूँ कि, जिन्होंने सायंकाल मेंअपनी सखी के द्वारा, अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के लिये, अनेक प्रकार की भोज्यवस्तुभेज दी हैं, पश्चात् उसी सखी के द्वारा लाये हुए, अपने स्वामी श्रीकृष्ण के प्रसादपाने से जिनका हृदय हर्षित हो रहा है। मैं, उन श्रीकृष्ण का स्मरण करता हूँकि, जिन्होंने गोचारण के अनन्तर वन से घर में आकर, भली प्रकार स्नान कियाहै, मनोहर वेष धारण किया है, तथा माँ यशोदा के द्वारा जिनके ऊपर लाड़-चाव-प्यार किया गया है। पश्चात् गोशाला में पहुँच कर जिन्होंने गोश्रेणी कादोहन किया है। उसके बाद नन्दभवन में जाकर जिन्होंने रात्रिभोजन किया है॥
श्रीराधिका सायंकाले,कृष्ण लागि पाठाइले,सखीहस्ते विविध मिष्टान्न।कृष्णभुक्त शेष आनि,सखी दिल सुख मानि,पाञा राधा हइल प्रसन्न॥
स्नात रम्यवेश धरि,यशोदा लालित हरि,सखासह गोदोहन करे।नानाविध पम् अन्न,पाञा हैल परसन्न,स्मरि आमि परम आदरे॥