Bhajana Gīti
Kirtan

श्रीगीतम्

Śrīla Rūpa Gosvāmī1 min read
KrishnaBhakti
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देव! भवन्तं वन्दे।मन्मानस-मधुकरमर्पय निज, -पद-पंकज-मकरन्दे॥ ध्रु0॥
यद्यपि समाधिषु विधिरपि पश्यति, न तव नखाग्रमरीचिम्।इदमिच्छामि निशम्य तवाच्युत! तदपि कृपाद्भुतवीचिम्॥
भक्तिरुदञ्चति यद्यपि माधव! न त्वयि मम तिलमात्री।परमेश्वरता तदपि तवाधिक - दुर्घटघटन - विधात्री॥
अयमविलोलतयाद्य सनातन, कलिताद्भुत - रसभारम्।निवसतु नित्यमिहामृतनिन्दनि, विन्दन् मधुरिमसारम्॥

हे भगवन् श्रीकृष्ण! मैं आपकी वन्दना करता हूँ। कृपया मेरे मनरूप- भ्रमर को अपने चरणकमलों के मकरन्द में लगा लीजिये, अर्थात् उसको अपने चरणारविन्दों का रस चखा दीजिये, जिससे वह अन्यत्र आसक्ति न करे। यद्यपि ब्रह्मा भी, समाधियों में भी, तुम्हारे चरणनखों के अग्रभाग की एक किरण को भी नहीं देख पाते हैं, तो भी हे अच्युत! तुम्हारी कृपा की आश्चर्यमयी तरंग को सुनकर, अर्थात् ‘न शक्यः स त्वया द्रष्टुमस्माभिर्वा बृहस्पते! यस्य प्रसादं कुरुते स वै तं द्रष्टुमर्हति॥ अथापि ते देव! पदाम्बुजद्वयप्रसादलेशानुगृहीत एव।’ (भा0 10/14/29) इत्यादि उक्तियों से यह जानकर कि, आपकी प्राप्ति केवल आपकी कृपा से ही साध्य है, यह बात सुनकर, मैं यह चाहता हूँ। हे माधव! यद्यपि तुम्हारे में मेरी तिलमात्र भी भक्ति प्रगट नहीं हो रही है, तो भी तुम्हारी परमेश्वरता तो अतिशय अघटित घटना का विधान करनेवाली है, उसी के द्वारा मेरा मनोरथ पूरा कर दीजिये। हे सनातन! तुम्हारे चरणारविन्द, अमृत का भी तिरस्कार करने वाले हैं, अतः मेरा मनरूप-मधुकर तृष्णारहित होकर, निश्चलतापूर्वक तुम्हारे चरणारविन्दों में ही नित्यनिवास करता रहे, एवं अद्भुतरस के भार को तथा माधुर्य के सार को प्राप्त करता रहे, मेरी यही प्रार्थना है। श्लेषपक्ष में — यह भावार्थ है कि, तुम्हारी कृपा श्रीसनातन गोस्वामी के द्वारा निर्णीत है।

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