हे नन्दनन्दन! वस्तुतः मैं आपका नित्यकिंकर हूँ, किन्तु अब निज कर्मदोष से विषय संसार-सागर में पड़ा हूँ। काम, क्रोध, मत्सरादि ग्राह मुझे निगलने को दौड़ रहे हैं। दुराशा दुश्चिन्ता की तरंगों में इधर-उधर बह रहा हूँ। कुसंगरूप-प्रबलवायु और भी व्याकुल कर रहा है। ऐसी दशा में आपके बिना मेरा कोई आश्रय नहीं है। कर्म, ज्ञान, योग, तप आदिक तृण-गुच्छों के समान इधर-उधर तैर रहे हैं, पर क्या उनका आश्रय लेकर कोई संसार-सागर के पार जा सकता है? हाँ, कभी-कभी ऐसा तो होता है कि, संसार-सागर में डूबता हुआ जन, उनको भी पकड़ कर, अपने साथ डुबा लेता है। आपकी कृपा के बिना और कोई आश्रय नहीं हो सकता है। केवल आपका नाम ही ऐसी दृढ़ नौका है, जिसके आश्रय से यह जीव, संसारसिन्धु को पार कर सकता है, पर उसका आश्रय मिले, यह भी आपकी कृपा पर निर्भर है। आप शरणागतवत्सल हैं, मुझ अनाश्रित को, अपने चरणकमलों में संलग्र रजकण के समान जानें, आपकी करुणा के बिना, मुझ साधनशून्य का, संसार से निस्तार का कोई उपाय नहीं है।(5)
मैं, उन श्रीमती राधिका का स्मरण करता हूँ कि, जिन्होंनेअपराह्नकाल में अपने घर पहुँच कर, भली प्रकार स्नान करके, रमणीयवेष धारण कर, अपने प्यारे श्यामसुन्दर के लिये, कर्पूरकेलि एवंअमृतकेलि आदि अनेक प्रकार के भोज्य उपहार बनाये हैं, एवं वनसे व्रज में आते समय, प्रियतम श्रीकृष्ण के मुखारविन्द के दर्शन से,जिनको पूर्ण हर्ष प्राप्त हो रहा है। एवं मैं, उन श्रीकृष्ण का स्मरणकरता हूँ कि, जो अपराह्न के समय गो-गण एवं सखाओं के सहितव्रज की ओर चल दिये हैं, एवं मार्ग में मिली हुई श्रीराधिका के दर्शनसे तृप्त हो रहे हैं, तथा अपने पिता आदि व्रजवासियों से जो प्रेमपूर्वकमिल रहे हैं, एवं पश्चात् घर जा कर माँ यशोदा ने जिनको स्नान करायाहै॥
श्रीराधिका गृहे गेला,कृष्ण लागि विरचिला,नानाविध खाद्य उपहार।स्नात रम्य वेश धरि,प्रियमुखेक्षण करि,पूर्णानन्द पाइल अपार॥
श्रीकृष्णापराह्नकाले,धेनु मित्र लञा चले,पथे राधामुख निरखिया।नन्दादि मिलन करि,यशोदा मार्जित हरि,स्मर मन आनन्दित हञा॥