न धनं न जनं न सुन्दरीं, कवितां वा जगदीश! कामये।मम जन्मनि जन्मनीश्वरे, भवताद्भक्तिरहैतुकी त्वयि॥ 4॥
हे जगदीश! मैं, न धन चाहता हूँ, न जन चाहता हूँ, न सुन्दर कविता ही चाहता हूँ। चाहता हूँ केवल, हे प्राणेश्वर! आपके श्रीचरणकमलों में मेरी जन्म-जन्म में अहैतुकी भक्ति हो।(4)
धन, जन नाहि मागों - कविता सुन्दरी।शुद्धभक्ति देह’ मोरे कृष्ण! कृपा करि॥
अति दैन्ये पुनः मागे दास्यभक्ति-दान।आपनाके करे संसारी-जीव अभिमान॥
प्रभु ! तव पदयुगे मोर निवेदन।नाहि मागि देह-सुख, विद्या, धन, जन॥ 1॥
नाहि मागि स्वर्ग आर मोक्ष नाहि मागि।ना करि प्रार्थना कोन विभूतिर लागि’॥ 2॥
निजकर्म - गुण - दोषे ये ये जन्म पाइ।जन्मे जन्मे येन तव नाम - गुण गाइ॥ 3॥
एइमात्र आशा मम तोमार चरणे।अहैतुकी भक्ति हृदे जागे अनुक्षणे॥ 4॥
विषये ये प्रीति एबे आछये आमार।सेइमत प्रीति हउक चरणे तोमार॥ 5॥
विपदे सम्पदे ताहा थाकुक समभावे।दिने दिने वृद्धि हउक नामेर प्रभावे॥ 6॥
पशु - पक्षी ह’ये थाकि स्वर्गे वा निरये।तव भक्ति रहु भक्तिविनोद-हृदये॥ 7॥
मध्याह्नेऽन्योन्यसंगोदित-विविधविकारादि-भूषाप्रमुग्धौ,वाम्योत्कण्ठातिलोलौ स्मरमख-ललिताद्यालि-नर्माप्तशातौ।दोलारण्यांबु-वंशीहृतिरतिमधुपानार्क-पूजादिलीलौ,राधाकृष्णौ सतृष्णौ परिजनघटया सेव्यमानौ स्मरामि॥ 4॥
मैं, उन श्रीराधाकृष्ण का स्मरण करता हूँ कि, जो मध्याह्नकाल मेंपरस्पर के संग से प्रगट हुए, अनेक प्रकार के सात्त्विक विकार रूप भूषणें सेअत्यन्त मनोहर हो रहे हैं, एवं प्रेममयी कुटिलता तथा परस्पर मिलन कीउत्कण्ठा से, जो अतिशय तृष्णायुक्त हो रहे हैं, एवं कन्दर्परूप-यज्ञ में श्रीललिता-विशाखा आदि सखियों के परिहासरूप शाकल्य से जो सुखी हो रहे हैं, एवं जोदोलालीला, वनविहार, जलविहार, वंशीचोरी, रमण, मधुपान, तथा सूर्यपूजाआदि लीलाओं में लगे रहते हैं, और जो अपने अन्तरंग-सेवकसमुदाय के द्वारासमयानुसार सेवित होते रहते हैं॥
राधाकुण्डे सुमिलन,विकारादि विभूषण,वाम्योत्कण्ठ मुग्धभावलीला।सम्भोग नर्मादि रीति,दोला खेला वंशीहृति,मधुपान सूर्यपूजा खेला॥
जलखेला वन्याशन,छल सुप्ति वन्याटन,बहु लीलानन्दे दुइजने।परिजन सुवेष्ठित,राधाकृष्ण सुसेवित,मध्याह्नकालेते स्मरि मने॥