Bhajana Gīti
Kirtan

तृतीय-याम-कीर्तन

Bhaktivinoda Ṭhākura2 min read
Guru TattvaKrishnaRadhaMahaprabhuHarinamBhakti
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तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥ 3॥

श्रीचैतन्यमहाप्रभु कहते हैं कि — अपने को तृण से भी नीचा समझकर, वृक्ष से भी सहनशील बनकर, स्वयं अमानी होकर, दूसरों को मान देनेवाला बनकर, सदैव श्रीहरिनाम- संकीर्तन करता रहे।(3)

उत्तम हञा आपनाके माने ‘तृणाधम’।दुइ प्रकारे सहिष्णुता करे वृक्षसम॥
वृक्ष येन काटिलेह किछुना बोलय।शुखाइया मैले कारे पानी ना मागय॥
येइ ये मागये, तारे देय आपन धन।घर्म - वृष्टि सहे, आनेर करये रक्षण॥
उत्तम हञा वैष्णव हबे निरभिमान।जीवे सम्मान दिबे जानि ‘कृष्ण’-अधिष्ठान॥
एइमत हञा येइ कृष्णनाम लय।श्रीकृष्णचरणे ताँर प्रेम उपजय॥
श्रीकृष्णकीर्तने यदि मानस तोहार।परम यतने तँहि लभ अधिकार॥ 1॥
तृणाधिक हीन, दीन, अकिन्चन, छार।आपने मानबि सदा छाड़ि’ अहंकार॥ 2॥
वृक्षसम क्षमागुण करबि साधन।प्रतिहिंसा त्यजि’, अन्ये करबि पालन॥ 3॥
जीवन - निर्वाहे आने उद्वेग ना दिबे।पर - उपकारे निज - सुख पासरिबे॥ 4॥
हइलेओ सर्वगुणे गुणी महाशय।प्रतिष्ठाशा छाड़ि’ कर अमानी हृदय॥ 5॥
कृष्ण - अधिष्ठान सर्वजीवे जानि’ सदा।करबि सम्मान सबे आदरे सर्वदा॥ 6॥
दैन्य, दया, अन्ये मान प्रतिष्ठा - वर्जन।चारि गुणे गुणी हइ करह कीर्तन॥ 7॥
भक्तिविनोद काँदि’ बले प्रभु - पाय।हेन अधिकार कबे दिबे हे आमाय॥ 8॥
पूर्वाह्ने धेनुमित्रैर्विपिनमनुसृतं गोष्ठलोकानुयातं,कृष्णं राधाप्तिलोलं तदभिसृतिकृते प्राप्ततत्कुण्डतीरम्।राधां चालोक्य कृष्णं कृतगृहगमनामार्ययार्कार्चनायै,दिष्टां कृष्णप्रवृत्त्यै प्रहितनिजसखीवर्त्मनेत्रां स्मरामि॥ 3॥
मैं, उन श्रीकृष्णचन्द्र का स्मरण करता हूँ कि, जो पूर्वान्ह में गो-गणएवं मित्रों के सहित वृन्दावन में चल दिये हैं, एवं श्रीनन्द-यशोदा आदि व्रजवासीलोग जिनके पीछे-पीछे चल रहे हैं, तथा अपनी अनुनय विनय से व्रजवासियोंको लौटाकर, श्रीराधिका की प्राप्ति के लिये जो सतृष्ण हो रहे हैं, अतएवश्रीराधिका के अभिसार के लिये जो श्रीराधाकुण्ड के तीर पर पहुँच गये हैं। मैं,उन श्रीमती राधिका का स्मरण करता हूँ कि, जो वन में जाते हुए श्रीकृष्ण कोदेखकर, अपने घर चली जाती हैं, एवं जटिला-नामक अपनी सास के द्वारा जोसूर्यपूजन के निमित्त वन में भेजी गई हैं, तथा श्रीकृष्ण का वृतान्त जानने केलिये, अपने द्वारा भेजी हुई, अपनी सखियों के मार्ग में, जो अपने नेत्रों को प्रेरितकरती रहती हैं।धेनु सहचर संगे,कृष्ण वने याय रंगे,गोष्ठजन अनुव्रत हरि।राधासंग लोभे पुनः,राधाकुण्ड तट वन,याय धेनु संगी परिहरि॥
कृष्णेर इंगित पाञा,राधा निज गृहे याञा,जटिलाज्ञा लय सूर्यार्चने।गुप्ते कृष्णपथ लखि,कतक्षणे आइसे सखी,व्याकुलिता राधा स्मरि मने॥

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