नाम्रामकारि बहुधा निजसर्वशक्ति-स्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः।एतादृशी तव कृपा भगवन्! ममाऽपि,दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नाऽनुरागः ॥ 2॥
श्रीचैतन्यमहाप्रभु विषाद और दैन्य में कहते हैं कि — हे भगवन्! जीवों की भिन्न-भिन्न रुचि को रखने के लिये ही तो, आपने अपने मुकुन्द, माधव, गोविन्द, दामोदर, घनश्याम, श्यामसुन्दर, यशोदानन्दन इत्यादि नाम रखे, और प्रत्येक नाम में अपनी संपूर्ण शक्ति भी स्थापित कर दी, एवं स्मरण के विषय में देश-काल-शुद्धाशुद्धी का भी नियम बन्धन तोड़ दिया। हाय प्रभो! आपकी तो जीवों पर ऐसी अहैतुकी कृपादृष्टि वृष्टि है, तथापि मेरा तो ऐसा दुर्भाग्य है कि आपके नाम में अनुराग उत्पन्न नहीं हुआ। (2)
अनेक लोकेर - वान्छा अनेक प्रकार।कृपाते करिल अनेक नामेर प्रचार॥
खाइते - शुइते यथा - तथा नाम लय।देश-काल-नियम नाहि, सर्वसिद्धि हय॥
सर्वशक्ति नामे दिला करिया विभाग।आमार दुर्दैव, नामे नाहि अनुराग॥
तुहुँ दयासागर तारयिते प्राणी,नाम अनेक तुया शिखाओलि आनि॥ 1॥
सकल शकति देइ नामे तोहारा,ग्रहणे राखलि नाहि कालविचारा॥ 2॥
श्रीनामचिन्तामणि तोहारि समाना,विश्वे बिलाओलि करुणा - निदाना॥ 3॥
तुया दया ऐछन परम उदारा।अतिशय मन्द, नाथ ! भाग हमारा॥ 4॥
नाहि जनमल नामे अनुराग मोर।भकतिविनोद - चित्त - दुःखे विभोर॥ 5॥
राधां स्नातविभूषितां ब्रजपयाहूतां सखीभिः प्रगे,तद्गेहे विहितान्नपाकरचनां कृष्णाऽवशेषाऽशनाम्।कृष्णं बुद्धमवाप्तधेनुसदनं निर्व्यूढगोदोहनं,सुस्नातं कृतभोजनं सहचरैस्तां चाथ तं चाश्रये॥ 2॥
मैं, उन श्रीमती राधिका का आश्रय लेता हूँ कि, जो प्रातःकालीन स्नानके अनन्तर अलंकृत हुई हैं, एवं व्रजेश्वरी श्रीयशोदा के द्वारा बुलाई गई हैं, तथाउन्हीं के घर में अपनी सखियों के साथ मिल-जुल कर, जिन्होंने श्रीकृष्णसेवार्थरसोई बनाई है, और श्रीकृष्ण के भोजन कर लेने के बाद, जिन्होंने उनका प्रसादसेवन किया है। एवं मैं, उन श्रीकृष्ण का आश्रय लेता हूँ कि, जिन्होंने प्रातःकालजागकर गोशाला में जा कर, सखाओं के सहित गोदोहन किया है, तथा भलीप्रकार स्नान करके सखाओं के सहित भोजन किया है॥
राधा स्नात-विभूषित,श्रीयशोदा समाहूत,सखीसंगे तद्गृहे गमन।तथा पाक विरचन,श्रीकृष्णावशेषाशन,मध्ये मध्ये दुँहार मिलन॥
कृष्ण निद्रा परिहरि,गोष्ठे गोदोहन करि,स्नानाशन सहचर संगे।एइ लीला चिन्ता कर,नामप्रेमे गरगर,प्राते भक्तजन संगे रंगे॥
एइ लीला चिन्त आरकर संकीर्तन।अचिरे पाइबे तुमि भाव उद्दीपन॥