नाम-माहात्म्य के विषय में, कलियुगपावनावतारी भगवान् श्रीचैतन्यमहाप्रभु की उक्ति तो सर्वोत्कृष्ट है, यथा — इस मायामय जगत् में श्रीकृष्णसंकीर्तन ही विजय को प्राप्त होता है 1. यही चित्तरूपी-दर्पण का शोधन करने वाला है, 2. संसारस्वरूप महादावानल को मिटाने वाला है, 3. कल्याणरूपिणी कुमुदिनी के विकास के लिये चन्द्रिका का विस्तार करने वाला है, 4. विद्यारूप-वधू का जीवनस्वरूप है, 5. आनन्दरूपी-समुद्र का बढ़ाने वाला है, 6. पद-पद पर पूर्ण अमृत का आस्वाद कराने वाला है, एवं 7. बाहर-भीतर से सर्वतोभावेन अन्तःकरणपर्यन्त स्नान करा देता है, अर्थात् जीव के अन्तःकरण के समस्त पाप-ताप नष्ट कर देता है। इस प्रकार श्रीनामसंकीर्तन की सात भूमिकाएँ हैं। आचाण्डाल पामरपर्यन्त को, इन सात भूमिकाओं पर यथाधिकार पहुँचा देने के कारण, कर्म-ज्ञानादि साधनों की अपेक्षा, श्रीनामसंकीर्तन की ही इस जगत् में पूर्ण विजय है। ‘परं विजयते’—पद से श्रीचैतन्यमहाप्रभु ने यह भी शिक्षा दी है कि — जैसे ज्ञान, कर्म आदिक साधन, भक्ति की सहायता के बिना दुर्बल रहते हैं, और अपना पूर्ण फल नहीं दे सकते किन्तु भ्क्तिबीज-श्रीनामसंकीर्तन ऐसा परापेक्षी नहीं है, अर्थात् यह कर्म, ज्ञान आदि की सहायता की अपेक्षा नहीं करता है, उनके बिना ही परं-केवलं विजयते। (1)
मैं, उन श्रीराधा-कृष्ण का स्मरण करता हूँ कि, जो दोनों, रात्रि केअन्त में व दिवस हो जानेपर राधाकृष्ण की गुप्त-श्रृंगारमयी लीलाएँअनधिकारीजनों के द्वारा भी जान ली जायँगी' इस कारण भयभीत हुई वृन्दादेवीके द्वारा, प्रेरित किये हुए अनेक प्रकार के पक्षियों की मधुरध्वनियों के द्वारा, तथाशुक-शारिका के द्वारा कर्णप्रिय होने से मनोहर, एवं वियोगजनक होने सेअप्रियपद्यों के द्वारा जगाये गये हैं, एवं सुखमयी शय्या से उठे हुए जिन दोनों कोश्रीललिता आदि अन्तरंग सखियों ने परस्पर हर्षित एवं तत्कालोचित-रति सेमनोहर देखा है। उसके बाद जो दोनों, वहीं पर स्थित होकर, फिर भी विलासकी तृष्णा से युक्त होकर भी ‘कक्खटी’-नामक बानरी की बोली से शंकितहोकर, अपने-अपने भवन में शैया पर पहुँच गये।देखिया अरुणोदय,वृन्दादेवी व्यस्त हय,कुञ्जे नाना रव कराइल।शुक-शारी पद्य शुनि,उठे राधा-नीलमणि,सखीगण देखि हृष्ट हैल॥