Bhajana Gīti
Kirtan

श्रीदामोदराष्टकम्

Satyavrata Muni3 min read
KrishnaRadhaBhakti
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नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपं,लसत्कुण्डलं गोकुले भ्राजमानम्।यशोदाभियोलूखलाद्धावमानं,परामृष्टमत्यंततो द्रुत्य गोप्या॥ 1॥
रुदन्तं मुहुर्नेत्रयुग्मं मृजन्तं,करांभोजयुग्मेन सातंकनेत्रम् ।मुहुःश्वासकंप-त्रिरेखांककण्ठ,स्थितग्रैवदामोदरं भक्तिबद्धम्॥ 2॥

मैं सच्चिदानन्दस्वरूप उन श्रीदामोदर भगवान् को नमस्कार करता हूँ कि, जो सर्वशक्तिमान् परमेश्वर हैं, एवं सत्, चित्, आनन्द-स्वरूप श्रीविग्रह वाले हैं। जिनके दोनों कानों में दोनों कुण्डल शोभा पा रहे हैं, एवं जो स्वयं गोकुल में विशेष शोभायमान हैं, एवं जो यशोदा के भय से (माखनचोरी के समय), ऊखल (ओखली) के ऊपर से दौड़ रहे हैं, और माँ यशोदा ने भी जिनके पीछे शीघ्रतापूर्वक दौड़कर, जिनकी पीठ को पकड़ लिया है। (1)

मैं, भक्तिरूप-रज्जु में बँधनेवाले उन्हीं दामोदर भगवान् को नमस्कार करता हूँ कि, जो माता के हाथ में लठिया को देखकर, रोते-रोते अपने दोनों कर-कमलों से, अपने दोनों नेत्रों को बारम्बार पौंछ रहे हैं, एवं भयभीत नेत्रों से युक्त हैं, तथा निरंतर लंबे-लंबे श्वासों से काँपते हुए, तीन रेखाओं से अंकित जिनके कण्ठ में स्थित मोतियों के हार भी हिल रहे हैं। (2)

इतीदृक्स्वलीलाभिरानन्दकुण्डे,स्वघोषं निमज्जन्तमाख्यापयन्तम्।तदीयेशितज्ञेषु भक्तैर्जितत्वं,पुनः प्रेमतस्तं शतावृत्ति वन्दे॥ 3॥
वरं देव! मोक्षं न मोक्षावधिं वा,न चान्यं वृणेहं वरेशादपीह।इदं ते वपुर्नाथ! गोपालबालं,सदा मे मनस्याविरास्तां किमन्यैः?॥ 4॥
इदं ते मुखांभोजमत्यन्तनीलै,-र्वृतं कुन्तलैः स्निग्धवक्रैश्च गोप्या।मुहुश्चुम्बितं बिम्बरक्ताधरं मे,मनस्याविरास्तामलं लक्षलाभैः॥5॥

मैं, उन्हीं दामोदर भगवान् को फिर भी प्रेमपूर्वक सैकड़ों बार प्रणाम करता हूँ कि, जो इस प्रकार की बाल्य-लीलाओं के द्वारा, अपने समस्त व्रज को, आनन्दरूप सरोवर में गोता लगवा रहे हैं, एवं अपने ऐश्वर्य को जाननेवाले ज्ञानियों के निकट, भक्तों के द्वारा अपने पराजय के भाव को प्रकाशित करते हैं। (3)

हे देव! आप सब प्रकार के वरदान देने में समर्थ हैं, तो भी मैं आपसे मोक्ष, अथवा मोक्ष का पराकाष्ठास्वरूप श्रीवैकुण्ठलोक, अथवा और वरणीय दूसरी किसी वस्तु की प्रार्थना नहीं करता हूँ। मैं तो केवल यही प्रार्थना करता हूँ कि, हे नाथ! मेरे हृदय में तो आपका यह बाल-गोपाल रूप श्रीविग्रह सदैव प्रगट होता रहे। इससे भिन्न दूसरे वरदानों से मुझे क्या प्रयोजन?। (4)

और हे देव! आपका यह जो मुखारविन्द अत्यन्त श्यामल, स्निग्ध, एवं घुँघराले केशसमूह से आवृत है, तथा बिंबफल के समान रक्तवर्ण के अधरोष्ठ से युक्त है, एवं माँ यशोदा जिसको बारंबार चूमती रहती है, वही मुखारविन्द, मेरे मन मन्दिर में प्रगट विराजमान होता रहे। दूसरे लाखों प्रकार के लाभों से मुझे कोई प्रयोजन नहीं है। (5)

नमो देव दामोदरानन्त विष्णो!प्रसीद प्रभो! दुःखजालाब्धिमग्रम्।कृपादृष्टिवृष्टयातिदीनं बतानु,-गृहाणेश! मामज्ञमेध्यक्षिदृश्यः॥ 6॥
कुबेरात्मजौ बद्धमूर्त्यैव यद्वत्,त्वया मोचितौ भक्तिभाजौ कृतौ च।तथा प्रेमभक्तिं स्वकां मे प्रयच्छ,न मोक्षे ग्रहो मेऽस्ति दामोदरेह॥ 7॥
नमस्तेऽस्तु दाम्रे स्फुरदीप्तिधाम्रे,त्वदीयोदरायाथ विश्वस्य धाम्रे।नमो राधिकायै त्वदीयप्रियायै,नमोऽनन्तलीलाय देवाय तुभ्यम्॥ 8॥

हे देव! हे दामोदर! हे अनन्त! हे सर्वव्यापक प्रभो! आपके लिये मेरा नमस्कार है। आप मेरे ऊपर प्रसन्न हो जाइये। मैं, दुःखसमूहरूप समुद्र में डूबा जा रहा हूँ। अतः हे सर्वेश्वर! अपनी कृपादृष्टिरूप अमृतवृष्टि के द्वारा अत्यन्त दीन, एवं मतिहीन मुझ को, अनुगृहीत कर दीजिये, एवं मेरे नेत्रों के सामने साक्षात् प्रगट हो जाइये। (6)

हे दामोदर! आपने ऊखल से बँधे हुए श्रीविग्रह के द्वारा ही, नलकूबरएवं मणिग्रीव नामक कुबेर-पुत्रों को, जिस प्रकार विमुक्त एवं भक्तियुक्त करदिया था, उसी प्रकार मेरे लिये भी, अपनी प्रेमभक्ति दे दीजिये, क्योंकि मेराआग्रह तो आपकी इस प्रेमभक्ति में ही है, किन्तु मोक्ष में नहीं है॥ 7॥
हे देव! प्रकाशमान दीप्तिसमूह के आश्रयस्वरूप आपके उदर में बँधीहुई रज्जु के लिये, एवं जगत् के आधारस्वरूप आपके उदर को भी मेरा बारंबारप्रणाम है। और आपकी परमप्रेयसी श्रीराधिका के लिए मेरा प्रणाम है, तथाअनन्त लीलावाले देवाधिदेव आपके लिये भी मेरा कोटिशः प्रणाम है॥ 8॥

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