Bhajana Gīti
Kirtan

श्रीगोविन्द-स्तोत्रम्

Brahma-saṁhitā11 min read
Guru TattvaKrishnaMahaprabhuBhakti
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चिन्तामणिप्रकरसद्मसु कल्पवृक्ष-लक्षावृतेषु सुरभीरभिपालयन्तम्।लक्ष्मीसहस्रशतसम्भ्रमसेव्यमानंगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 1॥
वेणुं म्णन्तमरविन्ददलायताक्षंबर्हावतंसमसिताम्बुदसुन्दरांगम्।कन्दर्पकोटिकमनीयविशेषशोभंगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 2॥
आलोलचन्द्रक-लसद्वनमाल्यवंशी-रत्नांगदं प्रणयकेलिकलाविलासम्।श्यामं त्रिभंगललितं नियतप्रकाशंगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 3॥

मैं, आदि पुरुष उन श्रीगोविन्द भगवान् का भजन करता हूँ कि, जो गोलोक में चिन्तामणि -समुदाय से बने हुए, एवं लाखों कल्पवृक्षों से परिवेष्टित भवनों में कामधेनु-स्वरूपा अनन्त गैयाओं की स्नेहपूर्वक सर्वतोभाव से रक्षा करते रहते हैं, तथा लक्ष्मीस्वरूपा हजारों गोपांगनाओं के सैकड़ों प्रकार के विलासों द्वारा सेवित होते रहते हैं।(1)

मैं, आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द भगवान् का भजन करता हूँ कि, जो अपने नित्य-वृन्दावन में नित्य ही वेणु बजाते रहते हैं, जिनके नेत्र कमलदल के समान विशाल हैं, जो मोरमुकुट धारण करते हैं, जिनका श्रीविग्रह श्याममेघ के समान मनोहर है, एवं जिनकी शोभा करोड़ों कामदेवों की अपेक्षा भी विशेष मनोहर है।(2)

मैं, आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द भगवान् का भजन करता हूँ कि, जिनके मस्तकपर मोर मुकुट विराजमान है, गले में वनमाला, अधरपर वंशी, एवं भुजाओं में रत्नजटित बाजूबन्द शोभायमान हैं, एवं जिनका विलास स्नेह भरे परिहास की कला से युक्त है, तथा जिनका श्याम स्वरूप त्रिभंगललित बाँकी झाँकी से युक्त है, एवं जो एकरस रहने वाले प्रकाश से युक्त हैं।(3)

अंगानि यस्य सकलेन्द्रियवृत्तिमन्तिपश्यन्ति पान्ति कलयन्ति चिरं जगन्ति।आनन्दचिन्मयसदुज्ज्वलविग्रहस्यगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 4॥
अद्वैतमच्युतमनादिमनन्तरूप-माद्यं पुराणपुरुषं नवयौवनं च।वेदेषु दुर्लभमदुर्लभमात्मभक्तौगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 5॥

मैं, आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द भगवान् का भजन करता हूँ कि, जिनका श्रीविग्रह सच्चिदानन्दमय एवं सदा उज्ज्वल है, अतएव जिनके प्रत्येक अंग, प्रत्येक इन्द्रियों की वृत्ति से युक्त होकर, चिरकाल तक अनेक ब्रह्माण्डों को देखते हैं, उनकी रक्षा करते हैं, एवं उनका नियमन करते रहते हैं, अर्थात् भगवान का हाथ भी देख सकता है, बोल सकता है, एवं नेत्र भी रक्षा कर सकते हैं, सुन सकते हैं, इसी प्रकार अन्य इन्द्रियाँ भी अन्य इन्द्रियों के कार्यों को कर सकती हैं। इसीलिए गीता (13/14) में उनको ‘सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोक्षशिरोमुखम्’ इत्यादि रूपवाला कहा गया है।(4)

मैं, आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द भगवान् का भजन करता हूँ कि, जो अद्वैतरूप से कहे जाते हैं, अर्थात् ‘यह पृथ्वी में अद्वितीय राजा है’ इस दृष्टान्त के अनुसार अनन्त ब्रह्माण्डों में जो अद्वितीय हैं। तात्पर्य — जिनके सामन या जिनसे अधिक कोई भी दूसरा नहीं है, एवं जो अपने स्वरूप-सामर्थ्य आदि से, कभी भी च्युत नहीं होते हैं, अथवा जिनके भक्तों का, प्रलयकाल में भी पतन नहीं होता, एवं जो अनादि-अनन्त रूपों वाले होकर भी, आदि स्वरूप कहलाते हैं, एवं पुराणपुरुष होकर भी, नित्य नवयौवन से युक्त बने रहते हैं, एवं जिनका ज्ञान वेदों में भी दुर्लभ है।(5)

पन्थास्तु कोटिशतवत्सरसंप्रगम्योवायोरथापि मनसो मुनिपुंगवानाम्।सोऽप्यस्ति यत्प्रपदसीम्न्यविचिन्त्यतत्त्वेगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 6॥
एकोऽप्यसौ रचयितुं जगदण्डकोटिंयच्छक्तिरस्ति जगदण्डचया यदन्तः।अण्डान्तरस्थपरमाणुचयान्तरस्थंगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 7॥
यद्भावभावितधियो मनुजास्तथैवसंप्राप्य रूपमहिमासनयानभूषाः।सूक्तैर्यमेव निगमप्रथितैः स्तुवन्तिगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 8॥

मैं, आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द भगवान् का भजन करता हूँ कि, जो मार्ग, वायु एवं प्रधान-प्रधान मुनिजनों के मन के लिये भी, करोड़ों वर्षों के प्रयास से गम्य है, वह मार्ग, अचिन्त्य प्रभाववाले जिनके चरणारविन्दों के अग्रभाग में ही वर्तमान है, क्योंकि मणि, मंत्र एवं औषधियों का प्रभाव जिस प्रकार अचिन्त्य है, उसी प्रकार श्रीगोविन्द का तत्त्व भी अचिन्त्य है। अचिन्त्य- तत्त्व, तर्क से भी समझ में नहीं आ पाता है, अतः उसमें तर्क नहीं करना चाहिये।(6)

मैं, आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द भगवान् का भजन करता हूँ कि, जिनकी शक्ति करोड़ों ब्रह्माण्डों की रचना करने के लिये समर्थ है, एवं अनन्त ब्रह्माण्डसमूह भी जिनके भीतर विराजमान हैं, अतः स्वरूपतः जो एक ही हैं, तथा जो ब्रह्माण्डान्तर्वर्ती परमाणुसमूह के भीतर भी स्थित रहते हैं।(7)

मैं, आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द भगवान् का भजन करता हूँ कि, जिनके भाव से भावित बुद्धिवाले भावुक मनुष्यजन, जिनकी कृपा से, उन्हीं के समान रूप-महिमा-आसन-यान एवं वस्त्र-भूषण आदि को प्राप्त करके, वेदप्रसिद्ध पुरुषसूक्तों के द्वारा जिनकी स्तुति करते रहते हैं।(8)

आनन्दचिन्मयरसप्रतिभाविताभि-स्ताभिर्य एव निजरूपतया कलाभिः।गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूतोगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥9॥
प्रेमाञ्जनच्छुरितभ्क्तिविलोचनेनसन्तः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति।यं श्यामसुन्दरमचिन्त्यगुणस्वरूपंगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥10॥
रामादिमूर्तिषु कलानियमेन तिष्ठन्नानावतारमकरोद्भुवनेषु किन्तु।कृष्णः स्वयं समभवत् परमः पुमान् योगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 11॥

मैं, आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द भगवान् का भजन करता हूँ कि, जो प्राणीमात्र के आत्मास्वरूप होकर भी, अथवा गोलोक-निवासी अन्य प्रियवर्गों के परमश्रेष्ठ होने के नाते, जीवात्मा की तरह, उनके निकट रहकर भी आनन्दचिन्मयरस, अर्थात् परमप्रेममय उज्ज्वल नामक रस के द्वारा सराबोर स्वरूपवालीं, एवं निज स्वरूप होने के कारण, ह्लादिनीशक्ति की वृत्तिस्वरूपा गोपियों के साथ, गोलोकधाम में ही निवास करते हैं।(9)

मैं, आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द भगवान् का भजन करता हूँ कि, जो गोविन्द यद्यपि गोलोक में ही निवास करते हैं, तथापि अचिन्त्यगुण स्वरूपवाले, श्यामसुन्दर विग्रहवाले, जिन गोविन्द को सन्तजन, प्रेम-नामक अञ्जन से रञ्जित, भक्तिरूप नेत्र के द्वारा, अपने-अपने हृदयों में सदैव सर्वत्र देखते रहते हैं।(10)

वे ही परिपूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण, कभी-कभी संसार में भी, अपने अंश से स्वयं अवतार लेते हैं, इस भाव को वर्णन करते हुए ब्रह्मा कहते हैं— मैं, आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द का भजन करता हूँ कि, श्रीकृष्ण-नामक जो परमपुरुष अपनी कलाओं के नियम से, अर्थात् शक्तियों के परिमित प्रकाश के द्वारा, श्रीराम आदि मूर्तियों में स्थित होकर, भुवनों में अनेक अवतार धारण करते रहते हैं, किन्तु अट्ठाईसवें द्वापर के अन्तिम में, तो स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ही, परिपूर्णतम रूप से प्रगट होते हैं। (11)

यस्य प्रभा प्रभवतो जगदण्डकोटि-कोटिष्वशेषवसुधादि विभूतिभिन्नम् ।तद्ब्रह्म निष्कलमनन्तमशेषभूतंगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 12॥
माया हि यस्य जगदण्डशतानि सूतेत्रैगुण्यतद्विषयवेदवितायमानासत्वावलम्बि-परसत्त्व-विशुद्धसत्वंगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 13॥

मैं, आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द का भजन करता हूँ कि, कोटि-कोटि ब्रह्माण्डों में, पृथ्वी आदि समस्त विभूतियों से भिन्न-अखण्ड-अनन्त एवं निखिल स्वरूप जो ब्रह्म है, वह ब्रह्म भी, अनेक अवतार लेने वाले परमप्रभावशाली जिन गोविन्द की प्रभारूप से कहा जाता है। तात्पर्य — ब्रह्म एवं श्रीकृष्ण स्वरूपतः एक ही तत्त्व हैं, तथापि विशिष्ट रूप से साक्षात् प्रगट होने के कारण, श्रीकृष्ण धर्मीरूप से कहे जाते हैं, एवं अविशिष्टरूप से प्रगट होने के कारण, ब्रह्म श्रीकृष्ण का धर्मरूप कहा जाता है, अतः सूर्य एवं सूर्य की प्रभा की तरह श्रीकृष्ण मण्डलस्थानीय हैं, एवं ब्रह्म उनकी प्रभास्थानीय है। प्रभा जिस प्रकार मण्डल के अधीन रहती है, उसी प्रकार ब्रह्म की सत्ता भी श्रीकृष्ण के अधीन है, अतएव गीता (14/27) में भी कहा है कि ‘ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्’ इत्यादि।(12)

मैं, आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द का भजन करता हूँ कि, रजोगुण-तमोगुण- सत्त्वगुण ये तीनों गुण, एवं इन तीनों के विषय का प्रतिपादन करने वाले वेदों के द्वारा, जिसका विस्तार किया जाता है, ऐसी बहिरंगाशक्तिरूपा जिनकी माया, अनेक ब्रह्माण्डों की रचना करती रहती है, तो भी उस माया से उनका स्पर्श नहीं है, क्योंकि उनका स्वरूप तो रजोगुण-तमोगुण के आश्रयस्वरूप सत्वगुण से परे जो विशुद्धसत्वगुण है, अर्थात् रजोगुण-तमोगुण से रहित चित्शक्तिवृत्तिरूप जो विशुद्धसत्त्वगुण है, उस प्रकार के विशुद्धसत्त्ववाला है। कारण —श्रीकृष्ण में प्रकृति के सत्त्व आदि गुण नहीं रहते हैं, अतः श्रीविष्णुपुराण में कहा है कि ‘सत्त्वादयो न सन्तीशे यत्र च प्राकृता गुणाः। स शुद्धः सर्वशुद्धेभ्यपुमानाद्यः प्रसीदतु।’(13)

आनन्दचिन्मयरसात्मतया मनःसुयः प्राणिनां प्रतिफलन् स्मरतामुपेत्य।लीलायितेन भुवनानि जयत्यजस्रंगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 14॥
गोलोकनाम्रि निजधाम्रि तले च तस्यदेवी-महेश-हरि-धामसु तेषु तेषु।ते ते प्रभावनिचया विहिताश्च येनगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 15॥
सृष्टिस्थितिप्रलयसाधनशक्तिरेकाछायेव यस्य भुवनानि बिभर्ति दुर्गा।इच्छानुरूपमपि यस्य च चेष्टते सागोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 16॥

मैं, आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द का भजन करता हूँ कि, जो अपना स्मरण करने वाले प्राणियों के मन में उपस्थित होकर एवं आनन्द-चिन्मय- रसमय स्वरूप से प्रतिफलित होकर, अपने लीला-विलास के द्वारा, अनेक भुवनों को निरन्तर अपने वश में करते रहते हैं।(14)

मैं, आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द का भजन करता हूँ कि, जिस गोविन्द ने गोलोक-नामक अपने धाम में, एवं उसके नीचे क्रमशः विराजमान वैकुण्ठधाम- शिवधाम एवं देवीधाम आदि में, वे वे लोकोत्तर प्रभावसमुदाय विस्तारित कर दिये हैं। इस श्लोक में देवी-महेश आदि धामों की गिनती, दाहिनी ओर से बायीं ओर माननी चाहिये, अन्यथा शास्त्रप्रसिद्ध धामों की रचना का क्रम नहीं बन पायेगा।(15)

मैं आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द का भजन करता हूँ कि, संसार की उत्पत्ति, रक्षा एवं प्रलय करने की साधनशक्तिस्वरूपा अतुलनीय दुर्गादेवी, जिन गोविन्द की छाया की तरह अनुगत होकर, अनेक ब्रह्माण्डों का भरण-पोषण करती रहती है, तो भी वह दुर्गादेवी स्वतंत्रता के व्यवहार को छोड़कर, जिन गोविन्द की इच्छा के अनुसार ही चेष्टा करती है।(16)

क्षीरं यथा दधि विकारविशेषयोगात्सञ्जायते न हि ततः पृथगस्ति हेतोः।यः शम्भुतामपि तथा समुपैति कार्यात्गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 17॥
दीपार्चिरेव हि दशान्तरमभ्युपेत्यदीपायते विवृतहेतुसमानधर्मा।यस्तादृगेव हि च विष्णुतया विभातिगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 18॥
यः कारणार्णवजले भजति स्म योग-निद्रामनन्तजगदण्डसरोमकूपः।आधारशक्तिमवलम्ब्य परां स्वमूर्तिंगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 19॥

मैं, आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द का भजन करता हूँ कि, दुग्ध को जमानेवाले जामन के संबंध से, दुग्ध ही जिस प्रकार दधि के रूप में परिणत हो जाता है, एवं वह दधि अपने उपादानकारण-स्वरूप दुग्ध से पृथक् भी नहीं है, उसी प्रकार जो गोविन्द संसार का प्रलयरूप कार्य करने के लिये शंकर के रूप को प्राप्त कर लेते हैं।(17)

मैं, आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द का भजन करता हूँ कि, जिस प्रकार एक दीपक की शिखा ही, दूसरी बत्ती का संयोग पाकर, दूसरे दीपक के रूप में परिणत हो जाती है, एवं अपने मूलभूत पहले दीपक के समान धर्म को ही प्रकाशित करती रहती है, उसी प्रकार जो गोविन्द, विष्णुरूप से प्रकाशित हो जाते हैं।(18)

मैं आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द का भजन करता हूँ कि, अपने रोमकूपों में अनन्तब्रह्माण्डों को धारण करनेवाले जो गोविन्द, आधार-शक्तिरूप शेष-नामक अपनी दूसरी मूर्ति का आश्रय लेकर, कारणसमुद्र के जल में योगनिद्रा का सेवन करते हैं।(19)

यस्यैकनिश्वसितकालमथावलम्ब्यजीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथाः।विष्णुर्महान् स इह यस्य कलाविशेषोगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 20॥
भास्वान् यथाश्मशकलेषु निजेषु तेजःस्वीयं कियत् प्रकटयत्यपि तद्वदत्र।ब्रह्मा य एष जगदण्डविधानकर्तागोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 21॥
यत्पादपल्लवयुगं विनिधाय कुम्भद्वन्द्वे प्रणामसमये स गणाधिराजः।विघ्रान् विहन्तुमलमस्य जगत्त्रसस्यगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 22॥

मैं, आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द का भजन करता हूँ कि, गोविन्द के अभिन्नस्वरूप जिन महाविष्णु के, एक श्वास लेने के समय का अवलंबन करके, अपने (महाविष्णु के) रोमकूपों में विद्यमान अनन्त ब्रह्माण्डाधिपति जीवित बने रहते हैं, वे महाविष्णु भी, जिन गोविन्द के कलाविशेष कहे जाते हैं।(20)

सूर्यदेव, सूर्यकान्तमणि के नाम से विख्यात अपने पत्थर के टुकड़ों में, अर्थात् सूर्यकान्तमणियों में जिस प्रकार अपने किञ्चित तेज को प्रकट कर देते हैं, अर्थात् उनके द्वारा दाह आदिक कार्य भी जिस प्रकार स्वयं करते हैं, उसी प्रकार जो गोविन्द, यहाँ पर ब्रह्मा होकर, अनेक ब्रह्माण्डों को बनाने वाले बन जाते हैं, मैं, आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द का भजन करता हूँ।(21)

मैं आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द का भजन करता हूँ कि, पुराणप्रसिद्ध वे गणाधिराज (गणेश), जिन गोविन्द के दोनों पादपल्लवों को प्रणाम करते समय, अपने मस्तक के दोनों कुंभों पर धारण करके ही, इन तीनों लोकों के विघ्रों का विनाश करने के लिये समर्थ हो पाये हैं । कैमुत्यन्याय से श्रीकपिलदेव ने भी, माता देवहूति के प्रति भगवद्ध्यान वर्णन करते समय, श्रीगोविन्द के भजन-पूजन-स्तवन आदि को दृढ़ कर दिया है, यथा — वयत्पादनिःसृतसरित्प्रवरोदकेन तीर्थेन मूर्ध्न्यधिकृतेन शिवः शिवोऽभूत्' (भा0 3/28/22), अर्थात् जिन गोविन्द के चरणारविन्द से निकली हुई नदियों में श्रेष्ठ, श्रीगंगा के परमपावन जल को श्रद्धापूर्वक अपने मस्तकपर धारण कर, स्वयं मंगलमय श्रीमहादेवजी, और भी अधिक मंगलमय हो गये।(22)

अग्रिर्मही गगनमम्बु मरुद्दिशश्चकालस्तथात्ममनसीति जगत्त्रयाणि।यस्माद्भवन्ति विभवन्ति विशन्ति यं चगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 23॥
यच्चक्षुरेष सविता सकलग्रहाणांराजा समस्तसुरमूर्तिरशेषतेजाः।यस्याज्ञया भ्रमति सम्भृतकालचक्रोगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 24॥
धर्मोऽथ पापनिचयः श्रुतयस्तपांसिब्रह्मादिकीटपतगावधयश्च जीवाः।यद्दत्तमात्रविभवप्रकटप्रभावागोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 25॥

अग्रि, पृथ्वी, आकाश, जल, वायु, समस्त दिशाएं, काल, आत्मा (जीव) एवं मन आदि इन द्रव्यों से बने हुए तीनों लोक भी, जिन गोविन्द से उत्पन्न होते हैं, पुष्ट होते हैं, एवं प्रलयकाल में जिन गोविन्द में ही प्रविष्ट हो जाते हैं, अतः मैं आदिपुरुष उन्हीं श्रीगोविन्द का भजन करता हूँ।(23)

समस्त ग्रहों के राजा, एवं समस्त देवताओं की मूर्तिस्वरूप, तथा समस्त तेजोमय प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाला यह जो सूर्य है, वह भी जिन गोविन्द का नेत्रस्वरूप है, और जिनकी आज्ञा से कालचक्र को धारण कर, अहर्निश भ्रमण करता रहता है, अतः मैं तो आदिपुरुष उन्हीं श्रीगोविन्द का भजन करता हूँ।(24)

श्रुति-शास्त्रोक्त धर्म, पापों का समुदाय, समस्त वेद, एवं सब प्रकार के तप, तथा ब्रह्मा से लेकर कीट-पतंग-पर्यन्त जीवगण भी, जिन गोविन्द के द्वारा दिये गये वैभव से ही अपने-अपने प्रभाव को प्रकाशित कर पाते हैं, मैं, आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द का भजन करता हूँ।(25)

यस्त्विन्द्रगोपमथवेन्द्रमहो स्वकर्म-बन्धानुरूपफलभाजनमातनोति।कर्माणि निर्दहति किन्तु च भक्तिभाजांगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 26॥
यं क्रोधकामसहजप्रणयादिभीति-वात्सल्यमोहगुरुगौरवसेव्यभावैः।सञ्चिन्त्य तस्य सदृशीं तनुमापुरेतेगोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 27॥

मैं, आदिपुरुष उन श्रीगोविन्द का भजन करता हूँ कि, जो इन्द्रगोप (गहरे लाल रंग का एक बरसाती कीड़ा) को, अथवा इन्द्र को, अपने-अपने कर्मबन्धन के अनुरूप, फल का भागी बनाते रहते हैं, यही हर्ष की बात है।(26)

क्रोध, काम, सख्य, भय, वात्सल्य, मोह, गुरु के समान गौरव, और दास्यभाव आदि भावों के द्वारा, जिन गोविन्द का स्मरण करके, स्मरण करनेवाले जन, उस-उस भाव के अनुसार, तदनुरूप शरीर को प्राप्त कर चुके हैं, अतः मैं, तो आदिपुरुष उन्हीं श्रीगोविन्द भगवान् का भजन करता हूँ। इस स्तुति से ब्रह्मा के ऊपर प्रसन्न हुए श्रीगोविन्द, ब्रह्मा के प्रति बोले कि, धर्मानन्यान् परित्यज्य मामेकं भज विश्वसन्। यादृशी यादृशी श्रद्धा सिद्धिर्भवति तादृशी॥' (ब्र0सं0 5/ 61)। अन्य सभी धर्मों को छोड़कर, विश्वासपूर्वक केवल मेरा (श्रीकृष्ण का) ही भजन करो, क्योंकि जैसी-जैसी श्रद्धा होती है, वैसे-वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है।(27)

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