Bhajana Gīti
Kirtan

श्रीचौराष्टकम्

Gauḍīya Vaiṣṇava Tradition2 min read
KrishnaRadhaBhakti
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आदौ बकीप्राणमलौघचौरं, बाल्ये प्रसिद्धं नवनीतचौरम्।व्रजे चरन्तं च मृदो हि चौरं, चौराधिपं कृष्णमहं नमामि॥ 1॥
विधेः सुरेन्द्रस्य च गर्वचौरं, गोगोपगोपीजनचित्तचौरम्।श्रीराधिकाया हृदयस्य चौरं, चौराधिपं कृष्णमहं नमामि॥ 2॥
नागाधिराजस्य विषस्य चौरं, श्रीसूर्यकन्याखिलकष्टचौरम्।गोपीजनाज्ञान-दुकूल-चौरं, चौराधिपं कृष्णमहं नमामि॥ 3॥
वत्सासुरादेर्बलमान - चौरं, पित्रोस्तथाबन्धनदुःखचौरम्।कुब्जार्चनव्याज-मनोज-चौरं, चौराधिपं कृष्णमहं नमामि॥ 4॥

पहले पूतना के प्राण एवं पापराशि को चुराने वाले, बाल्यावस्था में माखन चुराने वाले, ब्रज में विचरण करते समय मृत्तिका चुरानेवाले, एवं प्रसिद्ध चौराधिपति श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। (1)

ब्रह्मा एवं इन्द्र के गर्व को चुरानेवाले, गो-गोप एवं गोपीजनों के चित्त को चुराने वाले, श्रीराधिका के हृदय को चुराने वाले, चौराधिपति श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। (2)

सर्पराज कालियनाग के विष को चुरानेवाले, श्रीयमुनाजी के समस्त कष्ट को चुरानेवाले, एवं गोपीजनों के अज्ञानरूप-चीर को चुराने वाले, चौराधिपति श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। (3)

वत्सासुर आदि दैत्यों के बल एवं अभिमान को चुरानेवाले, एवं कंस के कारागारस्थ माता-पिता के बन्धनरूप-दुःख को चुरानेवाले, तथा अपने पूजन के बहाने कुब्जा के मनोज को चुरानेवाले, चौराधिपति श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। (4)

निशाचराणामथ जीवचौरं, जीवात्मनः कल्मषसंघचौरम्।उपासकानां च विपत्तिचौरं, चौराधिपं कृष्णमहं नमामि॥ 5॥
सुहृत्सुदाम्रोह्यधनत्वचौरं, शोकस्य गत्वा विदुरस्य चौरम्।कृष्णापटाकर्षकगर्वचौरं, चौराधिपं कृष्णमहं नमामि॥ 6॥
युद्धे हि पार्थस्य विमोहचौरं, पुरःस्थितानां च बलस्य चौरम्।दिने च मायाबलसूर्य-चौरं, चौराधिपं कृष्णमहं नमामि॥ 7॥
चित्तस्य शीलस्य जनस्य चौरं, अनेकजन्मार्जितपापचौरम्।दास्यं गतानां च समस्त-चौरं, चौराधिपं कृष्णमहं नमामि॥ 8॥

निशाचरों के जीवन को चुराने वाले, एवं जीवात्माओं के पातकपुञ्ज को चुरानेवाले, तथा अपने उपासकों की विपत्ति को चुराने वाले, चौराधिपति श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। (5)

अपने मित्र सुदामा की निर्धनता को चुरानेवाले, विदुर के घर में जाकर उनके शोक को चुरानेवाले, एवं द्रौपदी के चीर को हरने वाले दुःशासन के गर्व को चुरानेवाले, चौराधिपति श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ । (6)

महाभारतयुद्ध में गीता-ज्ञान देकर, अर्जुन के विशालमोह को चुरानेवाले, एवं युद्धस्थल में अपने सामने खड़े हुए सैनिकों के बल को चुरानेवाले, तथा जयद्रथवध के दिन अपनी माया के बल से सूर्य को चुरानेवाले, चौराधिपति श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। (7)

भक्तजनों के चित्त एवं शील को चुरानेवाले, एवं अनेक जन्मों के द्वारा उपार्जित पापों को चुरानेवाले, तथा अपने सेवकों के समस्त पाप-ताप चुराने वाले, चौराधिपति श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। (8)

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