पहले पूतना के प्राण एवं पापराशि को चुराने वाले, बाल्यावस्था में माखन चुराने वाले, ब्रज में विचरण करते समय मृत्तिका चुरानेवाले, एवं प्रसिद्ध चौराधिपति श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। (1)
ब्रह्मा एवं इन्द्र के गर्व को चुरानेवाले, गो-गोप एवं गोपीजनों के चित्त को चुराने वाले, श्रीराधिका के हृदय को चुराने वाले, चौराधिपति श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। (2)
सर्पराज कालियनाग के विष को चुरानेवाले, श्रीयमुनाजी के समस्त कष्ट को चुरानेवाले, एवं गोपीजनों के अज्ञानरूप-चीर को चुराने वाले, चौराधिपति श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। (3)
वत्सासुर आदि दैत्यों के बल एवं अभिमान को चुरानेवाले, एवं कंस के कारागारस्थ माता-पिता के बन्धनरूप-दुःख को चुरानेवाले, तथा अपने पूजन के बहाने कुब्जा के मनोज को चुरानेवाले, चौराधिपति श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। (4)
निशाचरों के जीवन को चुराने वाले, एवं जीवात्माओं के पातकपुञ्ज को चुरानेवाले, तथा अपने उपासकों की विपत्ति को चुराने वाले, चौराधिपति श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। (5)
अपने मित्र सुदामा की निर्धनता को चुरानेवाले, विदुर के घर में जाकर उनके शोक को चुरानेवाले, एवं द्रौपदी के चीर को हरने वाले दुःशासन के गर्व को चुरानेवाले, चौराधिपति श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ । (6)
महाभारतयुद्ध में गीता-ज्ञान देकर, अर्जुन के विशालमोह को चुरानेवाले, एवं युद्धस्थल में अपने सामने खड़े हुए सैनिकों के बल को चुरानेवाले, तथा जयद्रथवध के दिन अपनी माया के बल से सूर्य को चुरानेवाले, चौराधिपति श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। (7)
भक्तजनों के चित्त एवं शील को चुरानेवाले, एवं अनेक जन्मों के द्वारा उपार्जित पापों को चुरानेवाले, तथा अपने सेवकों के समस्त पाप-ताप चुराने वाले, चौराधिपति श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। (8)