Bhajana Gīti
Kirtan

श्रीचौराग्रगण्यपुरुषाष्टकम्

Vallabhācārya2 min read
KrishnaRadhaBhakti
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व्रजे प्रसिद्धं नवनीतचौरं, गोपांगनानां च दुकूलचौरम्।अनेक-जन्मार्जित-पापचौरं, चौराग्रगण्यं पुरुषं नमामि॥ 1॥
श्रीराधिकाया हृदयस्य चौरं, नवांबुदश्यामलकान्तिचौरम्।पदाश्रितानां च समस्तचौरं, चौराग्रगण्यं पुरुषं नमामि॥ 2॥
अकिञ्चनीकृत्य पदाश्रितं यः, करोति भिक्षुं पथि गेहहीनम्।केनाप्यहो भीषणचौर ईदृग्, दृष्टःऽश्रुतो वा न जगत्त्रयेऽपि॥ 3॥
यदीयनामापि हरत्यशेषं, गिरिप्रसारानपि पापराशीन्।आश्चर्यरूपो ननु चौर ईदृग्, दृष्टः श्रुतो वा न मया कदापि॥ 4॥

व्रज में प्रसिद्ध, माखन चुरानेवाले, एवं गोपियों के चीर चुराने वाले, अपने आश्रितजनों के अनेक जन्मों के द्वारा उपार्जित पापों को चुरानेवाले— चौराग्रगण्यपुरुष को मैं प्रणाम करता हूँ। (1)

श्रीमती राधिका के हृदय को चुरानेवाले, नूतन-जलधर की श्यामकान्ति को चुरानेवाले, एवं निजचरणाश्रितों के समस्त पाप-ताप चुरानेवाल— चौराग्रगण्यपुरुष को मैं प्रणाम करता हूँ। (2)

जो अपने चरणाश्रितों को निष्किञ्चन बनाकर, मार्ग में घूमनेवाले अनिकेत-भिक्षुक बना देता है, हाय! ऐसा भयंकर चोर तो किसी ने तीनों लोकों में भी देखा या सुना नहीं। (3)

जिसका नाममात्र लेना भी, पर्वत के समान विशाल पापसमूह को भी समूल हर लेता है, ऐसे आश्चर्य रूपवाला चोर तो मैंने कभी भी कहीं देखा या सुना नहीं। (4)

धनं च मानं च तथेन्द्रियाणि, प्राणांश्च हृत्वा मम सर्वमेव।पलायसे कुत्र धृतोऽद्य चौर, त्वं भ्क्तिदाम्नासि मया निरुद्धः॥ 5॥
छिनत्सि घोरं यमपाशबन्धं, भिनत्सि भीमं भवपाशबन्धम्।छिनत्सि सर्वस्य समस्तबन्धं, नैवात्मनो भक्तकृतं तु बन्धम्॥ 6॥
मन्मानसे तामसराशिघोरे, कारागृहे दुःखमये निबद्धः।लभस्व हे चौर! हरे! चिराय, स्वचौर्यदोषोचितमेव दण्डम्॥ 7॥
कारागृहे वस सदा हृदये मदीयेमद्भक्तिपाशदृढबन्धननिश्चलः सन्।त्वां कृष्ण हे! प्रलयकोटिशतान्तरेपिसर्वस्वचौर! हृदयान्नहि मोचयामि॥ 8॥

हे चोर! मेरे धन-मान-इन्द्रियाँ-प्राण एवं सर्वस्व को हर कर, कहाँ भागे जा रहे हो? क्योंकि आज तो तुम भक्तिरूप-रज्जू से धारण कर, मेरे द्वारा रोक लिये गये हो। (5)

क्योंकि तुम, यमराज के भयंकर पाशबन्धन को तो काट देते हो, एवं संसार के भयंकर पाशबंधन को विदीर्ण कर देते हो, तथा सभी जनों के समस्त बन्धन को काट देते हो, किन्तु अपने प्रेमीभक्त के द्वारा रचे गये, अपने प्रेममय बन्धन को, तो तुम नहीं काट पाते हो। (6)

हे मेरा सर्वस्व चुराने वाले चोररूप-हरे! मैंने, आज तुम को अज्ञानरूप- अन्धकारसमुदाय से भयंकर एवं दुःखमय मेरे मनरूपी-कारागार में बाँध लिया है, अतः अपनी चोरीरूप-दोष के उचित दण्ड को ही, बहुत समय तक प्राप्त करते रहो॥ (7)

हे मेरा सर्वस्व चुराने वाले कृष्ण! मेरी भक्तिरूप-पाश के दृढ़बन्धन में निश्चल होकर, मेरे हृदयरूप-कारागार में सदैव निवास करते रहो, क्योंकि मैं तो तुम्हें अपने हृदयरूप-कारागार से, करोड़ों कल्पों में भी विमुक्त नहीं करूँगा। (8)

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