व्रज में प्रसिद्ध, माखन चुरानेवाले, एवं गोपियों के चीर चुराने वाले, अपने आश्रितजनों के अनेक जन्मों के द्वारा उपार्जित पापों को चुरानेवाले— चौराग्रगण्यपुरुष को मैं प्रणाम करता हूँ। (1)
श्रीमती राधिका के हृदय को चुरानेवाले, नूतन-जलधर की श्यामकान्ति को चुरानेवाले, एवं निजचरणाश्रितों के समस्त पाप-ताप चुरानेवाल— चौराग्रगण्यपुरुष को मैं प्रणाम करता हूँ। (2)
जो अपने चरणाश्रितों को निष्किञ्चन बनाकर, मार्ग में घूमनेवाले अनिकेत-भिक्षुक बना देता है, हाय! ऐसा भयंकर चोर तो किसी ने तीनों लोकों में भी देखा या सुना नहीं। (3)
जिसका नाममात्र लेना भी, पर्वत के समान विशाल पापसमूह को भी समूल हर लेता है, ऐसे आश्चर्य रूपवाला चोर तो मैंने कभी भी कहीं देखा या सुना नहीं। (4)
हे चोर! मेरे धन-मान-इन्द्रियाँ-प्राण एवं सर्वस्व को हर कर, कहाँ भागे जा रहे हो? क्योंकि आज तो तुम भक्तिरूप-रज्जू से धारण कर, मेरे द्वारा रोक लिये गये हो। (5)
क्योंकि तुम, यमराज के भयंकर पाशबन्धन को तो काट देते हो, एवं संसार के भयंकर पाशबंधन को विदीर्ण कर देते हो, तथा सभी जनों के समस्त बन्धन को काट देते हो, किन्तु अपने प्रेमीभक्त के द्वारा रचे गये, अपने प्रेममय बन्धन को, तो तुम नहीं काट पाते हो। (6)
हे मेरा सर्वस्व चुराने वाले चोररूप-हरे! मैंने, आज तुम को अज्ञानरूप- अन्धकारसमुदाय से भयंकर एवं दुःखमय मेरे मनरूपी-कारागार में बाँध लिया है, अतः अपनी चोरीरूप-दोष के उचित दण्ड को ही, बहुत समय तक प्राप्त करते रहो॥ (7)
हे मेरा सर्वस्व चुराने वाले कृष्ण! मेरी भक्तिरूप-पाश के दृढ़बन्धन में निश्चल होकर, मेरे हृदयरूप-कारागार में सदैव निवास करते रहो, क्योंकि मैं तो तुम्हें अपने हृदयरूप-कारागार से, करोड़ों कल्पों में भी विमुक्त नहीं करूँगा। (8)