Bhajana Gīti
Kirtan

श्रीजगन्नाथाष्टकम्

Gauḍīya Vaiṣṇava Tradition3 min read
KrishnaRadhaNityanandaJagannathBhakti
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कदाचित् कालिन्दीतट-विपिन-संगीत-तरलोमुदाभीरी-नारी - वदनकमलास्वाद - मधुपः।रमा - शम्भु - ब्रह्मामरपति-गणेशार्चितपदोजगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ 1॥
भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटेदुकूलं नेत्रान्ते सहचर - कटाक्षं च विदधते।सदा श्रीमद्वृन्दावन-वसति-लीलापरिचयोजगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥ 2॥
महाम्भोधेस्तीरे कनकरुचिरे नीलशिखरेवसन् प्रासादान्तः सहज-बलभद्रेण बलिना।सुभद्रा - मध्यस्थः सकल-सुर-सेवावसरदोजगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥ 3॥

कभी-कभी यमुनातीरस्थ श्रीवृन्दावन में वेणुगीत में चञ्चल, एवं गोपवनिताओं के मुखकमल के आनन्दपूर्वक आस्वाद लेनेवाले भ्रमरस्वरूप तथा लक्ष्मी-शिव-ब्रह्मा-इन्द्र एवं गणेश आदि देवताओं के द्वारा जिनके श्रीचरण पूजित होते रहते हैं, वे ही श्रीजगन्नाथदेव मेरे नेत्रमार्ग के पथिक बन जायें। (1)

बायीं भुजा में वेणु, सिरपर मोर-पंख, कटितट में पीताम्बर, एवं अपने नेत्र-प्रान्त में सहचरों के कटाक्ष को धारण करनेवाले, तथा श्रीवृन्दावन के निवास की लीलाओं से जो सदैव परिचित हैं, वे ही श्रीजगन्नाथदेव मेरे नेत्रमार्ग के पथिक बन जायँ। (2)

महासमुद्र के तीरपर सुवर्ण के समान सुन्दर नीलाचल के शिखर में, अपने बड़े भाई प्रबल बलदेवजी के साथ, अपने मन्दिर में निवास करने वाले, एवं सुभद्रा जिनके बीच में विराजमान है, तथा जो समस्त देवताओं को अपनी सेवा का अवसर देते रहते हैं, वे ही श्रीजगन्नाथदेव मेरे नेत्रमार्ग के पथिक बन जायँ। (3)

कृपा-पारावारः सजल-जलद-श्रेणि-रुचिरोरमावाणीरामः स्फुरदमल - पंकेरुहमुखः।सुरेन्द्रैराराध्यः श्रुतिगणशिखा - गीतचरितोजगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥ 4॥
रथारूढ़ो गच्छन् पथि मिलित-भूदेव-पटलैःस्तुति - प्रादुर्भावं प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः।दयासिन्धुर्बन्धुः सकलजगतां सिन्धुसुतयाजगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥ 5॥
परंब्रह्मापीडः कुवलय - दलोत्फुल्ल - नयनोनिवासी नीलाद्रौ निहित-चरणोऽनन्त-शिरसि।रसानन्दी राधा - सरस - वपुरालिंगन-सुखोजगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥ 6॥

जो करुणावरुणालय हैं, सजल जलदश्रेणी के समान श्यामसुन्दर हैं, एवं रमा तथा सरस्वतीदेवी के साथ विहार करने वाले हैं, एवं जिनका श्रीमुख विकसित निर्मल कमल के समान है, एवं जो समस्त देवेन्द्रों के आराधनीय हैं, तथा जिनके दिव्य-चरित्र श्रुतियों के शिरोभाग में गाये गये हैं, वे ही श्रीजगन्नाथदेव मेरे नेत्रमार्ग के पथिक बन जायँ। (4)

रथ में बैठकर चलते समय, मार्ग में मिलने वाले ब्राह्मण-समुदाय के द्वारा, पद-पद पर अपनी स्तुतियों के प्राकट्य को सुनकर, जो दया से युक्त हो जाते हैं, अतएव जो दया के सिन्धु एवं समस्त जगत् के बन्धु कहलाते हैं, वे ही श्रीजगन्नाथदेव, श्रीलक्ष्मीदेवी के सहित मेरे नेत्रमार्ग के पथिक बन जायँ। (5)

जो मुकुटमणिस्वरूप परब्रह्म हैं, एवं जिनके दोनों नेत्र नील-कमलदल के समान खिले हुए हैं, एवं जो नीलाचल में निवास करनेवाले हैं, एवं शेषजी के सिरपर अपने चरणों को स्थापित करनेवाले हैं, एवं भक्तिरस से ही आनन्दित होनेवाले हैं, तथा श्रीराधिका के सरस-शरीर के आलिंगन से ही जिनको सुख मिलता है, वे ही श्रीजगन्नाथदेव मेरे नेत्रमार्ग के पथिक बन जायँ। (6)

न वै याचे राज्यं न च कनक-माणिक्य-विभवंन याचेऽहं रम्यां सकल-जन-काम्यां वरवधूम्।सदा काले काले प्रमथपतिना गीतचरितोजगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥ 7॥
हर त्वं संसारं द्रुततरमसारं सुरपते !हर त्वं पापानां विततिमपरां यादवपते!अहो दीनेऽनाथे निहित-चरणो निश्चितमिदंजगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥ 8॥
जगन्नाथाष्टकं पुण्यं यः पठेत् प्रयतः शुचि।सर्वपाप-विशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति॥ 9॥

मैं, प्रसन्न हुए श्रीजगन्नाथदेव से राज्य नहीं माँगता, एवं सुवर्ण-मणि-माणिक्यरूप वैभव को भी नहीं माँगता, तथा सकलजन वांछनीय सुन्दरी-नारी को भी मैं नहीं चाहता, किन्तु जिनके चारुचरित्र शिवजी के द्वारा समय-समय पर सदैव गाये जाते हैं, वे ही श्रीजगन्नाथदेव मेरे नेत्रमार्ग के पथिक बन जायँ। (7)

हे सुरपते! तुम मेरे असार-संसार को शीघ्र ही हर लो। हे यादवपते! तुम मेरे उत्कृष्ट पापों की श्रेणी को हर लो। अहह! जो दीन एवं अनाथ के ऊपर ही अपने श्रीचरण को स्थापित करते हैं, यह जिनका निश्चित व्रत है, वे श्रीजगन्नाथदेव मेरे नेत्रमार्ग के पथिक बन जायँ। (8)

जो व्यक्ति पवित्र एवं सावधान होकर, पुण्यमय श्रीजगन्नाथाष्टक का पाठ करेगा, वह व्यक्ति सब पापों से रहित, विशुद्ध चित्तवाला होकर, विष्णुलोक को प्राप्त कर लेगा। (9)

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