Bhajana Gīti
Kirtan

श्रीदशावतारस्तोत्रम्

Jayadeva Gosvāmī5 min read
KrishnaMahaprabhuNityanandaBhakti
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प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदंविहित-वहित्र-चरित्रमखेदम् ।केशव! धृतमीनशरीर! जय जगदीश हरे!॥ 1॥

हे केशव! हे मीन का शरीर धारण करनेवाले! जगदीश! हे भक्तों का क्लेश हरने वाले हरे! तुम्हारी जय हो, क्योंकि प्रयलकालीन समुद्र के जल में, हयग्रीव-नामक दैत्य को मारकर, वेदों का उद्घार तो तुमने ही किया है, एवं उसी समय सप्तर्षियों के सहित सत्यव्रत-नामक राजर्षि को अनायास धारण करने के लिये, नौका का सा चरित्र करनेवाले भी तो तुम ही हो। (1)

क्षितिरिह विपुलतरे तिष्ठति तव पृष्ठेधरणि-धरणकिण-चक्रगरिष्ठे ।केशव! धृतकूर्मशरीर! जय जगदीश! हरे!॥ 2॥
वसति दशन-शिखरे धरणी तव लग्राशशिनि कलंकलेव निमग्रा।केशव! धृतशूकररूप! जय जगदीश! हरे!॥ 3॥
तव करकमलवरे नखमद्भुतश्रृंगंदलित-हिरण्यकशिपुतनु-भृंगम् ।केशव! धृतनरहरिरूप! जय जगदीश! हरे!॥ 4॥

हे केशव! हे कच्छप का शरीर धारण करनेवाले! जगदीश! हे भक्तों का मन हरनेवाले हरे! तुम्हारी जय हो, क्योंकि इस कच्छप अवतार में, पृथ्वी के धारण करने से, अथवा मन्दराचल के धारण करने से, सूखे व्रणसमूह से अतिशय कठिन, एवं अत्यन्त विशाल तुम्हारे पृष्ठभागपर पृथ्वी स्थित है। (2)

हे केशव! हे वराह का रूप धारण करनेवाले! जगदीश! हे भक्तों का पाप हरनेवाले हरे! तुम्हारी जय हो, क्योंकि तुम्हारे दाँत के अग्रभाग में संलग्र हुई पृथ्वी, चन्द्रमा में निमग्र हुई कलंक की कला की तरह निवास करती है। (3)

हे केशव! हे श्रीनृसिंह का रूप धारण करनेवाले! जगदीश! हे भक्तों का कष्ट हरनेवाले हरे! तुम्हारी जय हो, क्योंकि तुम्हारे श्रेष्ठकरकमल में अद्भुत अग्रभागवाला एक नख है, जिसने हिरण्यकशिपु के शरीररूप भ्रमर को विदीर्ण कर दिया। इसमें आश्चर्य की बात यही है कि, सामान्यतः कमल के अग्रभाग को भ्रमर ही विदीर्ण करता है, किन्तु यहाँ तो कमल के अग्रभाग ने भ्रमर को ही विदीर्ण कर डाला।(4)

छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन!पद-नख-नीरजनितजनपावन!केशव! धृतवामनरूप! जय जगदीश! हरे!॥ 5॥
क्षत्रिय-रुधिरमये जगदपगतपापंस्नपयसि पयसि शमित-भवतापम्।केशव! धृतभृगुपतिरूप! जय जगदीश! हरे!॥ 6॥
वितरसि दिक्षु रणे दिक्पतिकमनीयंदशमुख-मौलि-बलिं रमणीयम्।केशव! धृतरामशरीर! जय जगदीश! हरे!॥ 7॥

हे केशव! हे श्रीवामन का रूप धारण करनेवाले! जगदीश! हे भक्तों का अहंकार हरनेवाले हरे! तुहारी जय हो, क्योंकि तुम, बलिराजा के द्वारा दी हुई पृथ्वी को नापते समय, बलिराजा को छलते रहते हो, अतः अद्भुत वामन रूपवाले हो! उसी समय तुम्हारे चरणनख से उत्पन्न हुए गंगाजल के द्वारा, तुम समस्तजनों को पवित्र बनानेवाले हो।(5)

हे केशव! हे परशुराम का रूप धारण करनेवाले! जगदीश! हे संसार का सन्ताप हरनेवाले हरे! तुम्हारी जय हो, क्योंकि ब्राह्मणों के अभक्तरूप क्षत्रियों के रुधिरमय जल में (कुरुक्षेत्र में), संसारभर को पाप एवं सन्तापरहित बनाते हुए, आज भी स्नान कराते रहते हो।(6)

हे केशव! हे श्रीरामचन्द्र का विग्रह धारण करनेवाले! जगदीश! हे ऋषियों की व्यथा हरनेवाले हरे! तुम्हारी जय हो, क्योंकि तुम रामावतार में लंका के रणांगण में, दशों दिक्पालों के द्वारा वांछनीय एवं रमणीय, रावण के मस्तकरूप उपहार को, दशों दिशाओं में वितरण करते रहते हो।(7)

वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभंहलहति-भीति-मिलित-यमुनाभम् ।केशव! धृतहलधररूप! जय जगदीश! हरे!॥ 8॥
निन्दसि यज्ञ-विधेरहह श्रुतिजातंसदय-हृदय! दर्शित-पशुघातम्।केशव! धृतबुद्धशरीर! जय जगदीश! हरे! ॥ 9॥
म्लेच्छ-निवहनिधने कलयसि कलवालंधूमकेतुमिव किमपि करालम्केशव! धृतकल्किशरीर! जय जगदीश! हरे!॥ 10॥

हे केशव! हे श्रीबलराम का रूप धारण करनेवाले! जगदीश! हे दुष्टों का मद हरनेवाले हरे! तुम्हारी जय हो, क्योंकि तुम, श्रीबलराम अवतार में, गौरवर्णवाले श्रीविग्रह में, सजल-जलद के समान नीलांबर को धारण करते रहते हो, वह नीलांबर, हल के प्रहार से भयभीत हुई, अतएव सम्मिलित हुई, यमुना के समान प्रतीत होता है। (8)

हे केशव! हे बुद्ध का शरीर धारण करनेवाले! जगदीश! हे पाषण्ड का हरण करनेवाले हरे! तुम्हारी जय हो, क्योंकि तुम दया से युक्त हृदयवाले हो! अतएव अहिंसारूप परमधर्म को मानने-वाले हो। अहह! अतएव पशुओं की हिंसा का प्रदर्शन करनेवाले, यज्ञविधि के श्रुतिसमुदाय की निन्दा करते रहते हो। (9)

हे केशव! हे कल्कि शरीर धारण करनेवाले! जगदीश! हे कलिमल हरनेवाले हरे! तुम्हारी जय हो, क्योंकि तुम, म्लेच्छसमुदाय को मारने के निमित्त, दुष्टों का विनाशसूचक धूमकेतु (पुच्छल) तारा की तरह, अनिर्वचनीय कराल करवाल (तलवार) को धारण करते रहते हो। (10)

श्रीजयदेव-कवेरिदमुदितमुदारंश्रृणु सुखदं शुभदं भवसारम्।केशव! धृतदशविधरूप! जय जगदीश हरे!॥ 11॥
श्रीदशावतारप्रणामः।वेदानुद्धरते जगन्ति वहते भूगोलमुद्विभ्रतेदैत्यं दारयते बलिं छलयते क्षत्रक्षयं कुर्वते।पौलस्त्यं जयते हलं कलयते कारुण्यमातन्वतेम्लेच्छान्मूर्च्छयते दशाकृतिकृते कृष्णाय तुभ्यं नमः॥ 12॥

हे केशव! हे दश-प्रकार के अवतार धारण करानेवाले! जगदीश! हे भक्तों की वासना हरनेवाले हरे! तुम्हारी जय हो, तुम्हारे श्रीचरणों में मेरी यही विनम्र प्रार्थना है कि, श्रीजयदेव-कवि के द्वारा कहे हुए, इस दशावतार स्तोत्र को तुम प्रेमपूर्वक सुनते रहो, क्योंकि यह स्तोत्र तुम्हारे अवतारों के सारांश से भरा हुआ है, अतएव सर्वश्रेष्ठ, सुखद, एवं मंगलदायक है। इस कथन में भक्तों के लिये भी सुनने का आदेश है। (11)

हे दश-अवतार धारण करनेवाले श्रीकृष्ण! तुम्हारे लिए मेरा कोटिशः प्रणाम है, क्योंकि तुम मत्स्य रूप से वेदों का उद्घार करनेवाले हो, कूर्म रूप से संसार को धारण करने वाले हो, वराह रूप से भूगोल को उठानेवाले हो, श्रीनृसिंह रूप से हिरण्यकशिपु दैत्य को विदीर्ण करनेवाले हो, श्रीवामन रूप से बलि को छलनेवाले हो, श्रीपरशुराम रूप से दुष्ट-क्षत्रियों का विनाश करनेवाले हो, श्रीराम रूप से रावण को जीतनेवाले हो, श्रीबलराम रूप से हल को धारण करनेवाले हो, श्रीबुद्ध रूप से जीवों पर करुणा का विस्तार करनेवाले हो, एवं कल्कि रूप से म्लेच्छों को मूर्छित करनेवाले हो। (12)

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