हे कमला के अर्थात् सर्वलक्ष्मीमयी श्रीराधिका के पयोधरमण्डल का आश्रय लेने वाले! हे मकराकृतिकुण्डल धारण करने वाले! एवं मनोहर वनमाला धारण करनेवाले! देव! हरे! तुम्हारी बारंबार जय हो! (1)
हे सूर्यमण्डल को विभूषित करनेवाले! भवबन्धन को छेदन करने वाले! अतएव मननशील मुनिजनों के मनरूप-सरोवर में विहरण करनेवाले हंसस्वरूप! देव! हरे! तुम्हारी बारंबार जय हो। (2)
हे कालियनाग के मद का मर्दन करने वाले! अतएव व्रजजनों का मनोरञ्जन करने वाले! एवं यदुकुलरूप-कमल को विकसित करने के लिये सूर्यस्वरूप! देव! हरे! तुम्हारी बारंबार जय हो। (3)
हे मधुदैत्य, मुरदैत्य, एवं नरकासुर का विनाश करनेवाले! गरुड़पर बैठनेवाले! अतएव देवगणों की क्रीडा के आदिकारण-स्वरूप! देव! हरे! तुम्हारी बारंबार जय हो। (4)
हे निर्मल कमलदल के समान विशाल नेत्रोंवाले! संसार से विमुक्त करने वाले! अतएव त्रिभुवनरूप-भवन के आधारस्वरूप! देव! हरे! तुम्हारी बारंबार जय हो। (5)
हे रामावतार में जानकी को विभूषित करने वाले! एवं दूषण नामक राक्षस को जीतनेवाले! तथा युद्ध में रावण को शान्त करने वाले! देव! हरे! तुम्हारी बारंबार जय हो। (6)
हे नूतन-जलधर के समान वर्णवाले श्यामसुन्दर! एवं मन्दराचल को धारण करनेवाले! तथा श्रीराधारूप-महालक्ष्मी के मुखरूपचन्द्रपर आसक्त होने वाले चकोरस्वरूप! देव! हरे! तुम्हारी बारंबार जय हो। (7)
हे जयदेव गोस्वामी के संकट हरनेवाले प्रभो! हम सब भक्त, तुम्हारे श्रीचरणों में विनम्रभाव से पड़े हुए हैं, यह विचार लीजिये, एवं तुम्हारे विनम्र-भक्तों के विषय में कल्याण विधान कीजिये। हे देव! हरे! तुम्हारी बारंबार जय हो। (8)
हे देव! श्रीजयदेव-कवि के द्वारा विनिर्मित मंगलमय एवं निर्मल यह गीत, तुम्हारी प्रसन्नता का संपादन करता रहे, अथवा श्रवण एवं गायन करनेवाले भक्तों के लिये भी यह गीत हर्षित करता रहता है। अतएव हे देव! हे हरे! तुम्हारी बारंबार जय-जयकार हो। (9)