Bhajana Gīti
Kirtan

श्रीनित्यानन्दाष्टकम्

Vṛndāvana Dāsa Ṭhākura4 min read
KrishnaMahaprabhuNityanandaHarinamBhakti
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शरच्चन्द्र - भ्रान्तिं स्फुरदमल-कान्तिं गजगतिंहरि - प्रेमोन्मत्तं धृत-परम-सऽत्वं स्मितमुखम्।सदा घूर्णन्नेत्रं कर - कलित-वेत्रं कलिभिदंभजे नित्यानन्दं भजन-तरु-कन्दं निरवधि॥ 1॥
रसानामागारं स्वजनगण - सर्वस्वमतुलंतदीयैक - प्राणप्रतिम-वसुधा-जाह्नव-पतिम।सदा प्रेमोन्मादं परमविदितं मन्द - मनसांभजे नित्यानन्दं भजन-तरु-कन्दं निरवधि॥ 2॥

मैं, उन श्रीनित्यानन्द प्रभु का निरन्तर भजन करता हूँ कि, जो श्रीकृष्णभक्तिरूप-वृक्ष के मूलस्वरूप हैं, जिनका मुखमण्डल शरत्कालीन चन्द्रमा की शोभा को तिरस्कृत कर देता है, जिनकी निर्मलकान्ति स्फूर्ति पा रही है, जिनकी गति मत्तगजेन्द्र के समान है, जो श्रीकृष्णप्रेम में सदैव उन्मत्त बने रहते हैं, जो विशुद्ध सत्वमय श्रीविग्रह को धारण करने वाले हैं, जिनका श्रीमुख मन्दमुस्कान से युक्त है, एवं जिनके दोनों नेत्र श्रीहरि के प्रेम से सदा घूमते रहते हैं, जिनके हस्तकमल में वेत्र शोभा पा रहा है, और जो नाम-संकीर्तन के द्वारा कलिकाल का भेदन करनेवाले हैं।(1)

मैं, उन श्रीनित्यानन्द प्रभु का निरन्तर भजन करता हूँ कि, जो श्रीकृष्णभक्तिरूप-वृक्ष के मूलस्वरूप हैं, जो सभी रसों के आधार हैं, अपने भक्तजनों के सर्वस्व हैं, अनुपमेय हैं; अपने प्राणों के समान प्रियतमा वसुधा एवं जाह्नवादेवी के पति हैं, श्रीकृष्ण-प्रेम में जो सदैव उन्मत्त बने रहते हैं, एवं जो केवल मन्दबुद्धिवाले व्यक्तियों के द्वारा अज्ञात हैं।(2)

शचीसूनु - प्रेष्ठं निखिल - जगदिष्टं सुखमयंकलौ मज्जज्जीवोद्धरण-करणोद्दाम-करुणम्।हरेराख्यानाद्वा भव - जलधि - गर्वोन्नति-हरंभजे नित्यानन्दं भजन-तरु-कन्दं निरवधि॥ 3॥
अये भ्रातर्नृणां कलि-कलुषिणां किन्तु भवितातथा प्रायश्चितं रचय यदनायासत इमे।व्रजन्ति त्वामित्थं सह भगवता मंत्रयति योभजे नित्यानन्दं भजन-तरु-कन्दं निरवधि॥ 4॥
यथेष्टं रे भ्रातः कुरु हरिहरि-ध्वानमनिशंततो वः संसाराम्बुधि-तरण-दायो मयि लगेत्।इदं बाहु - स्फोटैरटति रटयन् यः प्रतिगृहंभजे नित्यानन्दं भजन-तरु-कन्दं निरवधि॥ 5॥

मैं, उन श्रीनित्यानन्द प्रभु का निरन्तर भजन करता हूँ कि, जो श्रीकृष्णभक्तिरूप-वृक्ष के मूलस्वरूप हैं, श्रीशचीनन्दन के अतिशय प्यारे हैं, समस्त जगत् के इष्ट हैं, सुखमय स्वरूप हैं, कलियुग में डूबते हुए जीवों का उद्घार करने के लिए अपार करुणा से युक्त हैं, और श्रीहरिनाम-संकीर्तन के द्वारा संसार-सागर के अहंकार की उन्नति को हरनेवाले हैं।(3)

मैं, उन श्रीनित्यानन्द प्रभु का निरन्तर भजन करता हूँ कि, जो श्रीकृष्णभक्तिरूप-वृक्ष के मूलस्वरूप हैं, एवं भगवान् श्रीकृष्णचैतन्यदेव के साथ इस प्रकार का विचार करते रहते हैं कि, हे भैया गौरांग! कलिकाल से कलुषित जीवों की क्या गति होगी, तथा कौनसा प्रायश्चित होगा? उसकी रचना कीजिये कि, जिससे ये कलिकाल के जीव अनायास ही आपको प्राप्त कर लें।(4)

मैं, उन श्रीनित्यानन्द प्रभु का निरन्तर भजन करता हूँ कि, जो श्रीकृष्णभक्तिरूप-वृक्ष के मूलस्वरूप हैं, तथा जो गौड़देश में प्रत्येक घर के दरवाजे पर अपनी भुजाओं को फैलाकर, हे भैयाओ! तुम सब मिलकर स्वेच्छापूर्वक निरन्तर श्रीहरिनाम की ध्वनि करते रहो, ऐसा करने से तुम सबका संसार-सागर से तरने का ' कर ' मेरे ऊपर लग जायगा, इस प्रकार उच्चारण करते हुए घूमते रहते हैं। (5)

बलात् संसाराम्भोनिधि-हरण-कुम्भोद्भवमहोसतां श्रेयः-सिन्धून्नति-कुमुद-बन्धुं समुदितम्।खलश्रेणी - स्फूर्जत्तिमिर - हर-सूर्य-प्रभमहंभजे नित्यानन्दं भजन-तरु-कन्दं निरवधि॥ 6॥
नटन्तं गायन्तं हरिमनुवदन्तं पथि पथिव्रजन्तं पश्यन्तं स्वमपि नदयन्तं जनगणम्।प्रकुर्वन्तं सन्तं सकरुण - दृगन्तं प्रकलनाद्भजे नित्यानन्दं भजन-तरु-कन्दं निरवधि॥ 7॥
सुबिभ्राणं भ्रातुः कर - सरसिजं कोमलतरंमिथो वक्त्रालोकोच्छलित-परमानन्द हृदयम्।भ्रमन्तं माधुर्यैरहह ! मदयन्तं पुरजनान्भजे नित्यानन्दं भजन-तरु-कन्दं निरवधि॥ 8॥

मैं, उन श्रीनित्यानन्द प्रभु का निरन्तर भजन करता हूँ कि, जो श्रीकृष्णभक्तिरूप-वृक्ष के मूलस्वरूप हैं, एवं जो हठपूर्वक संसार-सागर का शोषण करने के लिये अगस्त्यस्वरूप हैं, तथा सज्जनों के कल्याणरूप-समुद्र की उन्नति के लिये प्रगट पूर्णचन्द्रस्वरूप हैं, और खलश्रेणी के स्फूर्ति पाते हुए अज्ञानरूपी-अन्धकार को हरने के लिये सूर्यस्वरूप हैं।(6)

मैं, उन श्रीनित्यानन्द प्रभु का निरन्तर भजन करता हूँ कि, जो श्रीकृष्णभक्तिरूप-वृक्ष के मूलस्वरूप हैं, एवं जो गौड़देश के प्रत्येक मार्ग में नाचते-गाते हरि बोल, हरि बोल की ध्वनि करते हुए भ्रमण करते रहते हैं, तथा अपने ऊपर दया न करनेवाले जनसमुदाय को भी प्रेमपूर्वक देखकर, करुणायुक्त कटाक्षवाले बनाते हैं।(7)

मैं, उन श्रीनित्यानन्द प्रभु का निरन्तर भजन करता हूँ कि, जो श्रीकृष्णभक्तिरूप-वृक्ष के मूलस्वरूप हैं, तथा जो अपने भैया श्रीगौरांगमहाप्रभु के परम कोमल कर-कमल को धारण करनेवाले हैं, तथा परस्पर श्रीमुख के दर्शन से जिनके हृदय का परमानन्द उछल रहा है, और जो अपने माधुर्य से पुरवासीजनों को हर्षित करते हुए भ्रमण करते रहते हैं।(8)

रसानामाधारं रसिक - वर - सद्वैष्णव - धनंरसागारं सारं पतित - तति-तारं स्मरणतः।परं नित्यानन्दाष्टकमिदमपूर्वं पठति य-स्तदंघ्रिद्वन्द्वाब्जं स्फुरतु नितरां तस्य हृदये॥ 9॥

श्रीनित्यानन्द प्रभु के इस अपूर्व अष्टक का जो व्यक्ति प्रेमपूर्वक पाठ करता है, उसके हृदय में श्रीनित्यानन्द प्रभु के दोनों चरणकमल अत्यन्त स्फूर्ति पाते रहें, यह अष्टककार का आशीर्वाद है; क्योंकि यह श्रीनित्यानन्दाष्टक रसों का आधार है, रसिकवर-वैष्णवश्रेष्ठों का धनस्वरूप है, भक्तों के लिए भक्तिरसों का सारस्वरूप आगार है।(9)

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