मैं, श्रीरूप, सनातन, रघुनाथभट्ट, रघुनाथदास, श्रीजीव एवं गोपालभट्ट नामक इन छः गोस्वामियों की वन्दना करता हूँ कि, जो श्रीकृष्ण के नाम-रूप-गुण-लीलाओं के कीर्तन, गायन, एवं नृत्यपरायण थे; प्रेमामृत के समुद्रस्वरूप थे, विद्वान् एवं अविद्वान्रूप सर्वसाधारण जनमात्र के प्रिय थे, तथा सभी के प्रियकार्य करनेवाले थे, मात्सर्यरहित एवं सर्वलोक पूजित थे, श्रीचैतन्यदेव की अतिशय कृपा से युक्त थे, भूतल में भक्ति का विस्तार करके भूमि का भार उतारनेवाले थे।(1)
मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छः गोस्वामियों की वन्दना करता हूँ कि, जो अनेक शास्त्रों के गूढतात्पर्य विचार करने में परमनिपुण थे, भक्तिरूप-परमधर्म के संस्थापक थे, जनमात्र के परमहितैषी थे, तीनों लोकों में माननीय थे, शरणागतवत्सल थे, एवं श्रीराधाकृष्ण के पदारविन्द के भजनरूप आनन्द से मत्तमधुप के समान थे।(2)
मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छः गोस्वामियों की वन्दना करता हूँ कि, जो श्रीगौरांगदेव के गुणानुवाद की विधि में श्रद्धारूप-सम्पत्ति से युक्त थे, श्रीकृष्ण के गुणगानरूप-अमृत की वृष्टि के द्वारा प्राणीमात्र के पाप-ताप को दूर करनेवाले थे, तथा आनन्दरूप-समुद्र को बढ़ाने में परमकुशल थे, भक्ति का रहस्य समझा कर, मुक्ति की भी मुक्ति करने वाले थे।(3)
मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छः गोस्वामियों की बारंबार वन्दना करता हूँ कि, जो समस्त मण्डलों के आधिपत्य की श्रेणी को, लोकोत्तर वैराग्य से शीघ्र ही तुच्छ की तरह सदा कि लिये छोड़कर, कृपापूर्वक अतिशय दीन होकर, कौपीन एवं कंथा (गूदड़ी) को धारण करनेवाले थे, तथा गोपीभावरूप रसामृतसागर की तरंगों में आनन्दपूर्वक निमग्न रहते थे।(4)
मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छः गोस्वामियों की वन्दना करता हूँ कि, जो कलरव करनेवाले कोकिल-हंस-सारस आदि पक्षियों की श्रेणी से व्याप्त, एवं मयूरों के केकारव से आकुल, तथा अनेक प्रकार के रत्नों से निबद्ध मूलवाले वृक्षों के द्वारा शोभायमान श्रीवृन्दावन में, रात-दिन श्रीराधा-कृष्ण का भजन करते रहते थे, तथा जीवमात्र के लिये हर्षपूर्वक भक्तिरूप परम-पुरुषार्थ को देनेवाले थे ।(5)
विजय पा ली थी, एवं जो अपने को अत्यन्त दीन मानते थे, तथा श्रीराधाकृष्ण के गुणों की स्मृति से प्राप्त माधुर्यमय आनन्द के द्वारा विमुग्ध रहते थे।(6)
मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छः गोस्वामियों की वन्दना करता हूँ कि, जो प्रेमोन्माद के वशीभूत होकर, विरह की समस्त दशाओं के द्वारा ग्रस्त होकर, प्रमादी की भाँति, कभी राधाकुण्ड के तटपर, कभी यमुना के तटपर, एवं कभी वंशीवटपर सदैव घूमते रहते थे; और कभी-कभी श्रीहरि के गुणश्रेष्ठों को हर्षपूर्वक गाते हुए भाव में विभोर रहते थे।(7)
मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छः गोस्वामियों की वन्दना करता हूँ कि, जो ' हे व्रज की पूजनीय देवि! राधिके ! आप कहाँ हो? हे ललिते! आप कहाँ हो? हे व्रजराजकुमार! आप कहाँ हो? श्रीगोवर्धन के कल्पवृक्षों के नीचे बैठे हो, अथवा कालिन्दी के कमनीय कूल पर विराजमान वन-समूह में भ्रमण कर रहे हो क्या? ' इस प्रकार पुकारते हुए विरह-जनित पीड़ाओं से महान् विह्वल होकर, व्रजमण्डल में चारों ओर भ्रमण करते रहते थे।(8)