Bhajana Gīti
Kirtan

श्रीगौरकिशोराष्टकम्

Śrīla Rūpa Gosvāmī3 min read
Guru TattvaKrishnaRadhaMahaprabhuBhakti
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श्रीगौरधामाश्रितशुद्धभक्तं, रूपानुगाद्यं निरवद्यरूपम् ।वैराग्यधर्मोज्ज्वलविग्रहं तं, वन्दे प्रभुं गौरकिशोरसंज्ञम् ॥ 1॥
असत्प्रसंगं परिहाय नित्यं, गौरांग - सेवाव्रत - मग्रचित्तम् ।गौड़-व्रजाभेद-विशिष्ट-प्रज्ञं, वन्दे प्रभुं गौरकिशोरसंज्ञम् ॥ 2॥
श्रीधाम-मायापुर-दिव्य-गूढ़,-माहात्म्य-गीतोन्मुखरं वरेण्यम्।धन्यं महाभागवताग्रगण्यं, वन्दे प्रभुं गौरकिशोरसंज्ञम् ॥ 3॥
पूतावधूतव्रज - शीर्षरत्नं, श्रीराधिकाकृष्ण - निगूढ़भक्तम् ।सदा व्रजावेश-सराग-चेष्टं, वन्दे प्रभुं गौरकिशोरसंज्ञम् ॥ 4॥

मैं, परम प्रसिद्ध उन श्रीगौरकिशोर-नामक प्रभु की वन्दना करता हूँ कि, जो श्रीगौरधाम का आश्रय करनेवाले विशुद्धभक्त थे, श्रीरूप गोस्वामी के अनुगामियों में प्रधान थे, एवं जिनका रूप प्रशंसनीय था, तथा जिनका श्रीविग्रह उत्कट वैराग्यधर्म से समुज्ज्वल था।(1)

मैं, परम प्रसिद्ध उन श्रीगौरकिशोर-नामक प्रभु की वन्दना करता हूँ कि, जिनका चित्त असत्प्रसंगों को छोड़कर, नित्य श्रीगौरांगदेव की सेवारूप- व्रत में ही निमग्र रहता था, एवं जो गौड़मण्डल एवं व्रजमण्डल में विशिष्ट अभेदबुद्धि से युक्त थे।(2)

मैं, परम प्रसिद्ध उन श्रीगौरकिशोर-नामक प्रभु की वन्दना करता हूँ कि, जो श्रीधाम-मायापुर (श्रीगौरांग महाप्रभु की जन्मभूमि)के दिव्य एवं गूढ़ माहात्म्य के गायन में विशिष्ट-वक्ता थे, अतः भक्तों के वर्णन करने योग्य थे, तथा जो परम-प्रशंसनीय एवं भगवद्-भक्तों के अग्रगण्य थे।(3)

मैं, परम प्रसिद्ध उन श्रीगौरकिशोर-नामक प्रभु की वन्दना करता हूँ कि, जो परम-पवित्र अवधूतकुल के शिरोमणि थे, श्रीराधा-कृष्ण के गुप्तभक्त थे, तथा सदैव व्रज के आवेश के कारण रागानुगा-भक्ति की चेष्टा में ही लगे रहते थे।(4)

शोकास्पदातीत - प्रभाव - रम्यं, मूढैरवेद्यं प्रणताभिगम्यम् ।नित्यानुभूताच्युत - सद्विलासं, वन्दे प्रभुं गौरकिशोरसंज्ञम् ॥ 5॥
कापट्यधर्मान्वित-चण्डदण्ड, विधायकं सज्जन-संग-रंगम् ।श्रीकृष्णचैतन्यपदाब्जभृंगं, वन्दे प्रभुं गौरकिशोरसंज्ञम् ॥ 6॥
दामोदरोत्थानदिने प्रधाने, क्षेत्रे पवित्रे कुलियाभिधाने ।प्रपञ्चलीला-परिहारवन्तं, वन्दे प्रभुं गौरकिशोरसंज्ञम् ॥ 7॥
तव हि दयितदासे सत्यसूर्य-प्रकाशे, जगति दुरितनाशे प्रोद्यते चिद्विलासे ।वयमनुगतभृत्याः पादपद्मं प्रपन्ना, अनुदिनमनुकम्पां प्रार्थयामो नगण्याः॥ 8॥

मैं, परम प्रसिद्ध उन श्रीगौरकिशोर-नामक प्रभु की वन्दना करता हूँ कि, जो लोकोत्तर प्रभाव से रमणीय थे, अतएव मूर्ख लोग जिनके स्वरूप को नहीं जान पाते थे, एवं जो शरणागत-भक्तों के लिये सर्वतोभाव से प्राप्य थे, तथा जो श्रीकृष्ण के सुन्दर रास-विलास आदि का नित्य अनुभव करते रहते थे।(5)

मैं, परम प्रसिद्ध उन श्रीगौरकिशोर-नामक प्रभु की वन्दना करता हूँ कि, जो कपटमय-धर्म से युक्त व्यक्तियों को प्रचण्ड दण्ड देनेवाले थे, एवं सज्जनों के संग में ही रँगे रहते थे, तथा श्रीकृष्ण-चैतन्य-पदारविन्दों के अनुरक्त- भौंरे ही थे।(6)

मैं, परम प्रसिद्ध उन श्रीगौरकिशोर-नामक प्रभु की वन्दना करता हूँ कि, जिन्होंने श्रीहरि की देवोत्थानी-एकादशी के दिन कुलिया (कोलद्वीप अथवा वर्तमान शहर नवद्वीप) नामक प्रधान एवं पवित्र-क्षेत्र में अपनी प्रपञ्च-लीला का परित्याग किया था।(7)

हे परमगुरुदेव ! हम सब भक्त तो यद्यपि किसी गिनती में आने लायक नहीं हैं, तो भी आपके प्रधान-शिष्य उन श्रीवार्षभानवीदयितदास (ॐ विष्णुपाद परमहंस 108 श्री श्रीमद् भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद) के अनुगत सेवक हैं कि, जो श्रीप्रभुपाद सत्य वस्तु के प्रकाश के लिये सूर्य के समान हैं, एवं संसार में जो पाप नाशक एवं चिद्-विलास में ही तत्पर हैं; अतः आपके चरणारविन्दों के शरणागत हैं; प्रतिदिन आपकी अनुकम्पा की ही प्रार्थना करते रहते हैं।(8)

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