मैं, परम प्रसिद्ध उन श्रीगौरकिशोर-नामक प्रभु की वन्दना करता हूँ कि, जो श्रीगौरधाम का आश्रय करनेवाले विशुद्धभक्त थे, श्रीरूप गोस्वामी के अनुगामियों में प्रधान थे, एवं जिनका रूप प्रशंसनीय था, तथा जिनका श्रीविग्रह उत्कट वैराग्यधर्म से समुज्ज्वल था।(1)
मैं, परम प्रसिद्ध उन श्रीगौरकिशोर-नामक प्रभु की वन्दना करता हूँ कि, जिनका चित्त असत्प्रसंगों को छोड़कर, नित्य श्रीगौरांगदेव की सेवारूप- व्रत में ही निमग्र रहता था, एवं जो गौड़मण्डल एवं व्रजमण्डल में विशिष्ट अभेदबुद्धि से युक्त थे।(2)
मैं, परम प्रसिद्ध उन श्रीगौरकिशोर-नामक प्रभु की वन्दना करता हूँ कि, जो श्रीधाम-मायापुर (श्रीगौरांग महाप्रभु की जन्मभूमि)के दिव्य एवं गूढ़ माहात्म्य के गायन में विशिष्ट-वक्ता थे, अतः भक्तों के वर्णन करने योग्य थे, तथा जो परम-प्रशंसनीय एवं भगवद्-भक्तों के अग्रगण्य थे।(3)
मैं, परम प्रसिद्ध उन श्रीगौरकिशोर-नामक प्रभु की वन्दना करता हूँ कि, जो परम-पवित्र अवधूतकुल के शिरोमणि थे, श्रीराधा-कृष्ण के गुप्तभक्त थे, तथा सदैव व्रज के आवेश के कारण रागानुगा-भक्ति की चेष्टा में ही लगे रहते थे।(4)
मैं, परम प्रसिद्ध उन श्रीगौरकिशोर-नामक प्रभु की वन्दना करता हूँ कि, जो लोकोत्तर प्रभाव से रमणीय थे, अतएव मूर्ख लोग जिनके स्वरूप को नहीं जान पाते थे, एवं जो शरणागत-भक्तों के लिये सर्वतोभाव से प्राप्य थे, तथा जो श्रीकृष्ण के सुन्दर रास-विलास आदि का नित्य अनुभव करते रहते थे।(5)
मैं, परम प्रसिद्ध उन श्रीगौरकिशोर-नामक प्रभु की वन्दना करता हूँ कि, जो कपटमय-धर्म से युक्त व्यक्तियों को प्रचण्ड दण्ड देनेवाले थे, एवं सज्जनों के संग में ही रँगे रहते थे, तथा श्रीकृष्ण-चैतन्य-पदारविन्दों के अनुरक्त- भौंरे ही थे।(6)
मैं, परम प्रसिद्ध उन श्रीगौरकिशोर-नामक प्रभु की वन्दना करता हूँ कि, जिन्होंने श्रीहरि की देवोत्थानी-एकादशी के दिन कुलिया (कोलद्वीप अथवा वर्तमान शहर नवद्वीप) नामक प्रधान एवं पवित्र-क्षेत्र में अपनी प्रपञ्च-लीला का परित्याग किया था।(7)
हे परमगुरुदेव ! हम सब भक्त तो यद्यपि किसी गिनती में आने लायक नहीं हैं, तो भी आपके प्रधान-शिष्य उन श्रीवार्षभानवीदयितदास (ॐ विष्णुपाद परमहंस 108 श्री श्रीमद् भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद) के अनुगत सेवक हैं कि, जो श्रीप्रभुपाद सत्य वस्तु के प्रकाश के लिये सूर्य के समान हैं, एवं संसार में जो पाप नाशक एवं चिद्-विलास में ही तत्पर हैं; अतः आपके चरणारविन्दों के शरणागत हैं; प्रतिदिन आपकी अनुकम्पा की ही प्रार्थना करते रहते हैं।(8)