श्री श्रील माधवगोस्वामी-पादपद्मस्तवकैकादशकम्
जिनके चरणयुगल सैकड़ों सज्जनों के द्वारा वन्दित हैं, जो युगधर्म के प्रचारक जनों में अग्रगण्य हैं, जो जनसमूह के बीच सुन्दर-भाषण की शक्ति रखते हैं, ऐसे श्रीमाधवदेव के चरणों में मैं प्रणाम करता हूँ। (1)
जिनका शरीर गौरवर्ण का विशाल तथा मनोहर है, जो मन्द-मन्द मुस्कान से हास्य को बिखेरते हुए मुख को धारण करने वाले हैं। जिनकी भुजाएं जांघों तक लम्बी हैं, तथा सुन्दरता से युक्त हैं, ऐसे श्रीमाधवदेव के चरणों में मैं प्रणाम करता हूँ। (2)
जो अपने बाल्यकाल से ही पढ़ने में तल्लीनता से युक्त थे, माता जी के पास ही जिन्होंने शास्त्रों के मतों को ग्रहण किया। परमार्थ के लिए जिन्होंने घर का परित्याग कर दिया था, ऐसे श्रीमाधवदेव के चरणों में मैं प्रणाम करता हूँ। (3)
प्रभुपाद के चरणों में जिन्होंने अपनी बुद्धि तथा शरीर को अर्पण कर दिया; जिन्होंने गुरु के कार्य के लिए यति (संन्यासी) का वेश धारण किया और जो शरण में आए हुए जनों के हित करने में तत्पर रहते हैं, ऐसे श्रीमाधवदेव के चरणों में मैं प्रणाम करता हूँ। (4)
प्रभुपाद के मनोऽनुकूल भक्ति-सिद्धांत के प्रचार में जो संलग्न रहे हैं, अत्यन्त आदरणीय श्रीभक्ति विनोद ठाकुर के चरणों का जिन्होंने अच्छी तरह से सम्मान किया और जिन्होंने श्रीरघुनाथदास गोस्वामी, श्रीरूप गोस्वामी व श्री सनातन गोस्वामी द्वारा बताये पथ का अनुसरण किया, ऐसे श्रीमाधवदेव के चरणों में मैं प्रणाम करता हूँ। (5)
जो सहनशीलता की शक्ति को धारण करने में वृक्ष से भी बढ़ कर हैं। लघु प्राणियों के सेवनमात्र से जिनका हृदय प्रसन्न रहता है, जो हरिकीर्तन में सदा व्यस्त रहते हैं, ऐसे श्रीमाधवदेव के चरणों में मैं प्रणाम करता हूँ। (6)
जो मठमन्दिर आदि के निर्माण की कीर्ति धारण करने वाले हैं; जो गुरु तथा गौरांग महाप्रभु की कथाओं में नित्य लगे रहने वाले हैं; जो स्वयं धर्माचरण तथा परमधैर्य को धारण करने वाले हैं; ऐसे श्रीमाधवदेव के चरणों में मैं प्रणाम करता हूँ। (7)
जो करुणा के द्वारा आर्द्र हृदय से विष्णु-भक्त को बुलाने वाले हैं; जिनका कुल प्रशंसित तथा वन्दित कृत्यों के द्वारा प्रख्यात है ; देश तथा विदेश में जिनके चरणों की वन्दना की जाती है, ऐसे श्रीमाधवदेव के चरणों में मैं प्रणाम करता हूँ। (8)
गुरुओं की गरिमा को, गुरुओं की पंक्ति में रहकर जो सुरक्षित रखने का प्रयत्न करते रहते हैं; जो गुरु-भाईयों को गौरव प्रदान करने में सदा लगे रहते हैं; जो अपने अनुरक्तों तथा श्रेष्ठ सेवकों के लिए वाक्यों को धारण करने वाले हैं; ऐसे श्रीमाधवदेव के चरणों में मैं प्रणाम करता हूँ। (9)
जो भगवद्-भजन में सदा अनुराग करने वाले हैं, जो अपने नियमों के पालन में सदा दृढ़ता का आचरण करने वाले हैं, प्रभुपाद के दर्शाए मार्ग से जिन्होंने कोटि-कोटि व्यक्तियों का उद्घार किया है; ऐसे श्रीमाधवदेव के चरणों में मैं प्रणाम करता हूँ। (10)
हम अपराधी जनों को क्षमा प्रदान करने की कृपा कीजिए। हम पापों से युक्त संसार में आसक्त दीन जन हैं, हमें सदा-सर्वदा श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान करने की कृपा करें, ऐसे श्रीमाधवदेव के चरणों में मैं प्रणाम करता हूँ। (11)