श्रील तीर्थ गोस्वामी-द्वादशकम्
जो दूरवर्ती आसाम प्रदेश में आविर्भूत होकर बाल्यकाल के विद्याध्ययन में आनन्दित हुए, जो परम दयालु एवं दाताशिरोमणि के पुत्र रूप में स्थित तथा जो वैष्णव राज श्री शिव की आराधना में रत होकर वैष्णव आराधना रूप शुद्ध सद्गुण में स्थित हैं, ऐसे गुरुदेव श्रील तीर्थ गोस्वामी महाराज जी के चरणकमलों में मैं प्रणाम करता हूँ। (1)
जिनके श्रीअंग चंपक पुष्प से भी अतिकोमल तथा गौर वर्ण से युक्त हैं तथा जिनका मुखारविन्द मृदुमन्द हास्य युक्त और उज्ज्वल है। जो सर्वदा सुप्रसन्न चित्त हैं तथा जिन्होंने शम एवं दैन्यादि गुणों के द्वारा सुशोभित होकर संन्यासी वेष धारण किया है, ऐसे गुरुदेव श्रील तीर्थ गोस्वामी महाराज जी के चरणकमलों में मैं प्रणाम करता हूँ। (2)
जो श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी के अति प्रियतम शिष्य हैं, गुरुवर्ग गोष्ठी में जो अति-सेवापरायण सेवक के रूप में बड़ा आदर पाते हैं और समस्त वैष्णव समाज में जो आदृत हैं, समस्त वैष्णवगण जिनकी जय की घोषणा करते हैं, ऐसे गुरुदेव श्रील तीर्थ गोस्वामी महाराज जी के चरणकमलों में मैं प्रणाम करता हूँ। (3)
भृगुपात से शरीर छोड़ने की अभिलाषा से युक्त श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी की तरह जिन्होंने श्री गौरहरि के साक्षात् प्रकाश विग्रह अपने श्री गुरुदेव श्रील माधव गोस्वामी महाराज के अन्तर्धान होने की आशंका से पीड़ित होकर एवं विरहतप्त आर्त्त हृदय से युक्त होकर श्री गिरिराज गोवर्धन का आश्रय ग्रहण किया तथा जो श्री गौरहरि एवं श्रील गुरुदेव के मनोऽभीष्ट को पूर्ण करने की इच्छा से ही प्राण धारण किये हुए हैं, ऐसे गुरुदेव श्रील तीर्थ गोस्वामी महाराज जी के चरणकमलों में मैं प्रणाम करता हूँ। (4)
जिन्होंने अपने गुरुदेव श्रील माधव गोस्वामी महाराज जी के द्वारा प्रारम्भ किये गये श्रील प्रभुपाद जी की आविर्भाव स्थली के सेवा-संस्कार आदि कार्य को श्रील गुरुदेव एवं महाप्रभु के भक्तों की अन्तरंग अभिलाषा जानकर पूर्ण किया है और विशेष कीर्ति को प्राप्त किया है तथा जो अपने विनयादि गुणों के द्वारा श्री हरि के अतिशय प्रिय हैं, ऐसे गुरुदेव श्रील तीर्थ गोस्वामी महाराज जी के चरणकमलों में मैं प्रणाम करता हूँ। (5)
श्रील गुरुदेव की महिमा एवं वैभव को प्रकाशित कर जो स्वयं श्रील गुरुदेव के गौरव स्वरूप हैं, जिनकी महिमा सूर्य के समान देदीप्यमान है, जो मठ-मन्दिर (परमार्थ अनुशीलन केन्द्र) की रक्षा एवं व्यवस्थादि के लिये सदैव यत्नशील हैं तथा जो सदैव परमार्थ रसामृत का पान करनेवाले हैं, ऐसे गुरुदेव श्रील तीर्थ गोस्वामी महाराज जी के चरणकमलों में मैं प्रणाम करता हूँ। (6)
जो श्री गौरहरि के द्वारा प्रकाशित श्री हरिसंकीर्तन में नृत्य-परायण होकर उन्मत्त चित्त हैं, श्री गौरहरि को अपने हृदय में धारण कर ब्रजभाव में भावित हैं तथा भगवत् आराधना से युक्त पर्वादि में अन्नकूट आदि महोत्सव को शास्त्रविचार से अनुष्ठित कर समस्त भक्तों को आनन्दित करने वाले हैं, ऐसे गुरुदेव श्रील तीर्थ गोस्वामी महाराज जी के चरणकमलों में मैं प्रणाम करता हूँ। (7)
जिनके द्वारा अपने श्रील गुरुदेव की समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण हुई हैं तथा इसी के अन्तर्गत जिन्होंने श्री ब्रजभूमि स्थित श्री कुमुदवन में श्री गौरांग महाप्रभु की पादपीठ-स्थापना-सेवा द्वारा परम सौभाग्य को प्राप्त किया है, ऐसे गुरुदेव श्रील तीर्थ गोस्वामी महाराज जी के चरणकमलों में मैं प्रणाम करता हूँ। (8)
जिन्होंने श्रील रूप गोस्वामी, रघुनाथ दास गोस्वामी एवं ठाकुर भक्तिविनोद के पथ का अवलम्बन (अनुगमन) करते हुए स्वयं उर्जित भजन का आश्रय ग्रहण किया है, नैष्ठिक भजनशिक्षा का आचरण एवं प्रचार कर जिन्होंने समस्त जगत का कल्याण-विधान किया है तथा वृक्ष से भी अधिक सहनशील होकर शोभायमान हैं, ऐसे गुरुदेव श्रील तीर्थ गोस्वामी महाराज जी के चरणकमलों में मैं प्रणाम करता हूँ। (9)
जो ॐ विष्णुपाद श्रील भक्ति प्रमोद पुरी गोस्वामी महाराज जी की आदेश-वाणी को शिरोधार्य कर पाश्चात्य देशों में जीवकल्याण हेतु शुभ गमन करते हुए श्री गौरांग महाप्रभु के अमलप्रेम (प्रेम धर्म की कथा) का प्रचार प्रसार कर जगत का मंगल विधान कर रहे हैं, ऐसे गुरुदेव श्रील तीर्थ गोस्वामी महाराज जी के चरणकमलों में मैं प्रणाम करता हूँ। (10)
मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्री रामचन्द्र के अवतरण की चैत्र मास की शुक्ला नवमी तिथि ही जिनकी आविर्भाव तिथि है, ऐसी सर्वमंगलप्रद् भजन की इच्छा से युक्त जनों के लिये हरिनिष्ठा देने वाली अर्थात् शमदा तथा सुखप्रदा एवं सर्वदयाप्रदा तिथि में आविर्भूत होने वाले गुरुदेव श्रील तीर्थ गोस्वामी महाराज जी के चरणकमलों में मैं प्रणाम करता हूँ। (11)
हे संन्यासी स्वरूप श्रील तीर्थ गोस्वामी महाराज! हे मंगलमय कल्पतरु! इस स्तुति के अन्त में मेरी आपसे विनम्र प्रार्थना है कि आप कृपाकर सदैव के लिये मेरे समस्त अपराधों को क्षमा करें। हे विभु! आप तो अपने शरणागत जनों का पालन करने में पूर्ण समर्थ हैं, अतः आप अपनी कृपा शक्ति के द्वारा शीघ्र की नित्यकाल के लिये मुझे श्री गुरु-चरण-कमलों में अनन्य भक्ति प्रदान करें। (12)