Bhajana Gīti
Kirtan

श्रीशिक्षाष्टकम्

Gauḍīya Vaiṣṇava Tradition3 min read
KrishnaMahaprabhuHarinamBhakti
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चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्रिनिर्वापणंश्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम्।आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनंसर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसंकीर्तनम्॥ 1॥
नाम्रामकारि बहुधा निजसर्वशक्ति-स्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः।एतादृशी तव कृपा भगवन्! ममाऽपिदुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुरागः ॥ 2॥

नाम-माहात्म्य के विषय में, कलियुगपावनावतारी भगवान् श्रीचैतन्यमहाप्रभु की उक्ति तो सर्वोत्कृष्ट है, यथा — इस मायामय जगत् में श्रीकृष्णसंकीर्तन ही विजय को प्राप्त होता है 1. यही चित्तरूपी-दर्पण का शोधन करने वाला है, 2. संसारस्वरूप महादावानल को मिटाने वाला है, 3. कल्याणरूपिणी कुमुदिनी के विकास के लिये चन्द्रिका का विस्तार करने वाला है, 4. विद्यारूप-वधू का जीवनस्वरूप है, 5. आनन्दरूपी-समुद्र को बढ़ाने वाला है, 6. पद-पद पर पूर्ण-अमृत का आस्वाद कराने वाला है, एवं 7. बाहर-भीतर से सर्वतोभावेन अन्तःकरणपर्यन्त स्नान करा देता है, अर्थात् जीव के अन्तःकरण के समस्त पाप-ताप नष्ट कर देता है। इस प्रकार श्रीनामसंकीर्तन की सात भूमिकाएँ हैं। (1)

श्रीचैतन्यमहाप्रभु विषाद और दैन्य में कहते हैं कि — हे भगवन्! जीवों की भिन्न-भिन्न रुचियों को रखने के लिये ही तो, आपने अपने मुकुन्द, माधव, गोविन्द, दामोदर, घनश्याम, श्यामसुन्दर, यशोदानन्दन इत्यादि नाम रखे, और प्रत्येक नाम में अपनी संपूर्ण शक्ति भी स्थापित कर दी, एवं स्मरण के विषय में देश-काल-शुद्धि-अशुद्धि का भी नियम-बन्धन तोड़ दिया। हाय प्रभो! आपकी तो जीवों पर ऐसी अहैतुकी कृपादृष्टि-वृष्टि है, तथापि मेरा तो ऐसा दुर्भाग्य है कि आपके नाम में मेरा अनुराग उत्पन्न नहीं हुआ। (2)

तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥ 3॥
न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश! कामये।मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि॥ 4॥
अयि नन्दतनूज! किंकरं पतितं मां विषमे भावांबुधौ।कृपया तव पादपंकजस्थित-धूलीसदृशं विचिन्तय॥ 5॥

श्रीचैतन्यमहाप्रभु कहते हैं कि — अपने को तृण से भी नीचा समझकर, वृक्ष से भी सहनशील बनकर, स्वयं अमानी होकर, दूसरों को मान देनेवाला बनकर, सदैव श्रीहरिनामसंकीर्तन करता रहे।(3)

हे जगदीश! मैं, न धन चाहता हूँ, न जन चाहता हूँ, न सुन्दर कविता ही चाहता हूँ। चाहता हूँ केवल, हे प्राणेश्वर! आपके श्रीचरणकमलों में मेरी जन्म-जन्म में अहैतुकी भक्ति हो।(4)

हे नन्दनन्दन! वस्तुतः मैं आपका नित्यकिंकर हूँ, किन्तु अब निज कर्मदोष से विषम संसार-सागर में पड़ा हूँ। काम, क्रोध, मत्सरादि ग्राह मुझे निगलने को दौड़ रहे हैं। दुराशा-दुश्चिन्ता की तरंगों में इधर-उधर बह रहा हूँ। कुसंगरूप-प्रबलवायु और भी व्याकुल कर रहा है। ऐसी दशा में आपके बिना मेरा कोई आश्रय नहीं है। कर्म, ज्ञान, योग, तप आदिक तृण-गुच्छों के समान इधर-उधर तैर रहे हैं, पर क्या उनका आश्रय लेकर कोई संसार-सागर के पार जा सकता है? हाँ, कभी-कभी ऐसा तो होता है कि, संसार-सागर में डूबता हुआ जन, उनको भी पकड़ कर, अपने साथ डुबा लेता है। आपकी कृपा के बिना और कोई आश्रय नहीं हो सकता है। केवल आपका नाम ही ऐसी दृढ़ नौका है जिसके आश्रय से यह जीव, संसारसिन्धु को पार कर सकता है, पर उसका आश्रय मिले यह भी आपकी कृपा पर निर्भर है। आप शरणागतवत्सल हैं, मुझ अनाश्रित को, अपने चरणकमलों में संलग्र रजकण के समान जानें, आपकी करुणा के बिना, मुझ साधनशून्य का, संसार से निस्तार का कोई उपाय नहीं है।(5)

नयनं गलदश्रु-धारया वदनं गद्गदरुद्धया गिरा।पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नामग्रहणे भविष्यति?॥ 6॥
युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम्।शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्दविरहेण मे॥ 7॥
आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु मामदर्शनान्मर्महतां करोतु वा।यथा तथा वा विदधातु लंपटो मत्प्राणनाथस्तु स एव नाऽपरः॥ 8॥

हे प्रभो! आपका नाम ग्रहण करते समय, मेरे नयन अश्रुधारा से, मेरा मुख गद्गद वाणी से, और मेरा शरीर पुलकावलियों से कब व्याप्त होगा? (6)

हे सखि! गोविन्द के विरह से, मेरा निमेषमात्र काल भी युग के समान प्रतीत होता है, मेरी आँखों ने वर्षाऋतु का सा रूप धारण कर लिया है, और यह समस्त जगत् मुझे शून्य सा प्रतीत होता है।(7)

वह लंपट अपनी पादसेवा में आसक्त, मुझ दासी को प्रगाढ़ आलिंगन से भींचे, किंवा अपने दर्शन न देकर, मुझे मर्माहत करते हुए पीड़ा भी पहुँचाये, या अपनी जो अभिरुचि हो सो करे, परन्तु वही मेरा प्राणनाथ है। उनके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है।(8)

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