Bhajana Gīti
Kirtan

जय यशोदानन्दन

Gauḍīya Vaiṣṇava Tradition1 min read
KrishnaRadhaHarinamBhakti
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जय यशोदानन्दन, जय व्रजजन-रन्जनजय यमुनातीर - वनचारी॥ 2॥
श्रीराधामाधव की जय हो! कुञ्जविहारी की जय हो! गोपीजनवल्लभ की जय हो! गिरिवरधारी की जय हो! यशोदानन्दन की जय हो !ब्रजवासियों को आनन्द प्रदान करने वाले तथा यमुना के किनारे विचरण करनेवालेश्यामसुन्दर की जय हो!भजहुँ रे मन श्रीनन्दनन्दन, अभय चरणारविन्द रे।दुर्लभ मानव जन्म सत्संगे, तरह ए भवसिन्धु रे॥ 1॥
शीत आतप वात बरिषण, ए दिन यामिनी जागि’ रे।विफले सेबिनु कृपण दुरजन, चपल सुखलव लागि’ रे॥ 2॥
ए धन यौवन, पुत्र परिजन, इथे कि आछे परतीति रे।कमलदल-जल, जीवन टलमल, भजहुँ हरिपद निति रे॥ 3॥
श्रवण, कीर्त्तन, स्मरण, वन्दन, पाद सेवन, दास्य रे।पूजन, सखीजन, आत्मनिवेदन, गोविन्ददास अभिलाष रे॥ 4॥

हे मेरे मन! तुम यह दुर्लभ मानव-जन्म प्राप्तकर सत्संग में ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीश्यामसुन्दर के अभय अर्थात् समस्त प्रकार के भयों का विनाश करनेवाले श्रीचरणकमलों का भजन करो तथा इस अथाह भवसागर को पार कर लो। अरे मन! तू सर्दी-गर्मी, आँधी-तूफान, बरसात में तथा दिन-रात जागकर इन संसारी दुर्जनों की सेवा जिस सुख प्राप्ति की आशा से कर रहा है वह क्षणभर का सुख तो चंचल अर्थात् अनित्य है। अरे! इस धन, यौवन, पुत्र तथा परिजनों की तो बात ही क्या, स्वयं तेरा जीवन ही तो कमल के पत्ते पर स्थित पानी की बूँद की भाँति टलमल-टलमल कर रहा है अर्थात् तेरा जीवन भी कब समाप्त हो जायेगा, यह भी निश्चित नहीं है। अतः तुम भगवान के श्रीचरणकमलों का भजन करो। गोविन्ददास श्रवण, कीर्तन, स्मरण, वन्दन, पादसेवन, दास्य, पूजन, सख्य और आत्मनिवेदनरूप नवधा भक्ति की अभिलाषा करता है।

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