Bhajana Gīti
Kirtan

दैन्य-अपराधात्मक

Bhaktivinoda Ṭhākura3 min read
Guru TattvaKrishnaRadhaHarinamBhakti
PDF
आमार जीवन,सदा पापे रत,नाहिक पुण्येर लेश।परेरे उद्वेग,दियाछि जे कत,दियाछि जीवेरे क्लेश॥ 1॥
निज सुख लागि’,पापे नाहि डरि,दयाहीन स्वार्थपर।पर-सुखे दुःखी,सदा मिथ्या-भाषी,परदुःख सुखकर॥ 2॥
अशेष कामना,हृदि माझे मोर,क्रोधी दम्भपरायण।मदमत्त सदा,विषये मोहित,हिंसा-गर्व विभूषण॥ 3॥
निद्रालस्य-हत,सुकार्ये विरत,अकार्ये उद्योगी आमि।प्रतिष्ठा लागिया,शाठ्य आचरण,लोभहत सदा कामी॥ 4॥
ए हेन दुर्जन,सज्जन-वर्जित,अपराधी निरन्तर।शुभकार्य शून्य,सदानर्थमना,नाना दुःखे जर जर॥ 5॥
वार्द्धक्ये एखन,उपायविहीन,ता’ ते दीन अकिञ्चन।भकतिविनोद,प्रभुर चरणे,करे दुःख निवेदन॥ 6॥
अहो! मैं सारा जीवन पाप-कर्मों में ही लगा रहा, मैंने लेशमात्र भीपुण्य नहीं किया। न जाने कितने ही दूसरे जीवों को मैंने उद्वेग व क्लेश दिया।मैं ऐसा दयाहीन, स्वार्थी तथा मिथ्याभाषी हूँ कि अपने सुख के लिए पाप से भीनहीं डरता हूँ। दूसरे को सुखी देखकर मुझे ईर्ष्या होने लगती है और मैं दुःखीहो जाता हूँ एवं दूसरे को दुःखी देखकर मेरा हृदय आनन्द से भर जाता है। मैंबड़ा ही क्रोधी एवं दाम्भिक हूँ। अनन्त प्रकार की सांसारिक कामनाओं से मेराहृदय भरा हुआ है तथा मैं बड़ा ही क्रोधी व घमण्डी हूँ। मैं विषयों के मद मेंप्रमत्त हूँ तथा हिंसा और गर्व मेरे आभूषण स्वरूप हैं। निद्रा एवं आलस्यग्रस्तहोने के कारण सत् कार्यों में मेरी लेशमात्र भी रुचि नहीं होती परन्तु दुष्कर्मों मेंमेरा मन स्वतः ही रम जाता है। मैं बहुत ही कामी हूँ। दूसरों से प्रतिष्ठा प्राप्तकरने के लिए मैं कपटतापूर्ण व्यवहार करता हूँ। हे प्रभो! मैं ऐसा दुर्जन हूँ किवैष्णवों का संग तो मैंने कभी किया ही नहीं अपितु निरन्तर मैं उनके चरणों मेंअपराध करता रहता हूँ। मेरा अनर्थग्रस्त मन शुभ कर्मों को त्यागकर पाप कर्मोंमें ही लगा रहता है, जिसके फलस्वरूप नाना प्रकार के दुःखों से जर्जरित होरहा है। श्रीभक्तिविनोद ठाकुर जी भगवान के श्रीचरणों में अपना दुःख निवेदनकरते हुए कह रहे हैं कि मेरी हालत तो बड़ी दयनीय सी हो गयी है क्योंकिप्रभो! अब तो मेरी वृद्धावस्था आ गयी है और इससे बचने का कोई उपाय भीनहीं है।यशोमती - नन्दन, व्रजवर-नागर, गोकुल-रंजन कान्ह।गोपी-पराण-धन, मदन-मनोहर, कालीयदमन विधान॥ 1॥
अमन हरिनाम, अमिय विलासा।विपिन - पुरन्दर, नवीन - नागरवर, वंशीवदन सुवासा॥ 2॥
व्रजजन-पालन, असुरकुल-नाशन, नन्द-गोधन-रखवाला।गोविन्द माधव, नवनीत - तस्कर, सुन्दर नन्द-गोपाला॥ 3॥
यामुन - तटचर, गोपी - वसन हर, रास-रसिक कृपामय।श्रीराधावल्लभ, वृन्दावन - नटवर, भक्तिविनोद आश्रय॥ 4॥
ब्रज के श्रेष्ठ नागर जो समस्त गोकुलवासियों को आनन्द प्रदान करनेवाले, गोपियों के प्राणधनस्वरूप साक्षात् मदन (कामदेव) के मनको भी हरणकरनेवाले एवं कालीयनाग का दमन करनेवाले हैं, उन श्रीयशोदानन्दन की जयहो। उनका नाम अमल है अर्थात् चिन्मय है तथा अमृत के समान है और वेनवीन नागर (श्रीकृष्ण) विपिन (द्वादशवनों एवं उपवनों)के राजा हैं, उनके(श्रीमुख) अधरों पर वंशी सुशोभित हो रही है। ब्रजवासियों का पालन एवंअसुरों का विनाश करने वाले, नन्द महाराज की गायों की रक्षा करने वाले औरमाखनचुराने वाले नन्दनन्दन की जय हो। जिनके गोविन्द, माधव आदि अनेकनाम हैं, जो यमुना के किनारे नाना प्रकार की लीलाएँ करते हैं, गोपियों के वस्त्रोंका हरण करने वाले हैं तथा उनके साथ रास रचाने वाले हैं। भक्तिविनोदवृन्दावन के उस श्रेष्ठ नट श्रीराधावल्लभजी (राधाजी के प्राणनाथ) केश्री चरणों में आश्रय ग्रहण करता है।जय राधामाधव जय कुन्जविहारी।जय गोपीजनवल्लभ जय गिरिवरधारी॥ 1॥

Continue the Journey