Bhajana Gīti
Kirtan

गौरांग तुमि मोरे

Vāsudeva Ghoṣa2 min read
KrishnaMahaprabhuBhakti
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गौरांग तुमि मोरे दया ना छाड़िह।आपन करिया रांगा चरणे राखिह॥
तोमार चरण लागि सब तेयागिलुँ।शीतल चरण पाइया शरण लइलुँ॥
ए कुले ओ कुले मुञि दिलुँ तिलाञ्जलि।राखिह चरणे मोरे आपनार बलि॥
वासुदेव घोष बले चरणे धरिया।कृपा करि राख मोरे पदछाया दिया॥
हे गौरांग महाप्रभु! आप मेरे प्रति अपनी दया नहीं छोड़ना, मुझे अपनाबनाकर अपने लाल रंग के कोमल-कोमल श्रीचरणों में रखना। आपके श्रीचरणोंकी प्राप्ति हेतु मैंने सब कुछ त्याग कर दिया है, शीतल चरणों में अब मैंने शरणली है। मैंने इस कुल और उस कुल को त्याग दिया है, आप कृपा करके मुझेअपना कहकर अपने चरणों में रखना। वासुदेव घोष आपके चरणों को धारणकरके आपसे प्रार्थना करता है कि कृपा करके मुझे अपने चरणों की छाया में हीरखियेगा।बन्धुसंगे यदि तब रंग परिहास, थाके अभिलाष,तबे मोर कथा राख,जेयो नाको जेयो नाको,मथुराय केशीतीर्थ-घाटेर सकाश॥
गोविन्द विग्रह धरितथाय आछेन हरि,नयने बंकिम दृष्टि मुखे मन्दहास।किवा त्रिभंग ठाम,वर्ण समुज्ज्वल श्याम,नवकिशलय शोभा श्रीअंगे प्रकाश॥
अधरे वंशीटी तार,अनर्थेर मूलाधार,शिखिचूड़ाकेओ भाई करो न विश्वास॥
से मूर्ति नयने हेरे,केह नाहि घरे फिरे,संसारी गृहीर जे गो हय सर्वनाश।घटिबे विपद भारी,जेयो नाको हे संसारि,मथुराय केशीतीर्थ-घाटेर सकाश॥

हे भाई! बन्धु-बान्धवों के साथ यदि तेरी हास-परिहास करने की अभिलाषा हो तो मेरी एक बात मानो, मथुरा (वृन्दावन) में केशी घाट के निकट भूलकर भी मत जाना। वहाँ श्रीहरि गोविन्दजी के रूप में विराजमान हैं जिनकी बंकिम दृष्टि एवं श्रीमुखकमल पर मन्द-मन्द मुस्कान है। उनका क्या ही सुन्दर त्रिभंगस्वरूप है, उनका वर्ण उज्ज्वल श्यामवर्ण है। उनके अधरों पर वंशी विराजमान रहती है, जो समस्त अनर्थों की मूल आधार है। एक और बात, सिर पर धारण किए हुए मयूरपुच्छ का भी विश्वास मत करना। इस स्वरूप को जो अपने नेत्रों से एक बार भी दर्शन करता है, वह फिर वापिस घर नहीं लौटता। इस प्रकार संसारी व्यक्ति का सर्वनाश हो जाता है। इसीलिए मेरे मन में भय बैठा है। अतः हे संसारी व्यक्ति! मथुरा में केशीघाट के निकट कभी मत जाना, नहीं तो भयंकर विपदा में फंस जाओगे।

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