सूर्यपुत्री वह यमुना, मुझे सदैव पवित्र बनाती रहें कि, जो अपने भाई यमराजके नगरमें, अर्थात् यमालयमें जानेसे रोकनेवाली हैं एवं अपने दर्शनमात्रसे पापीजनोंको भी पापसिन्धुसे पार लगानेवाली हैं, अपने जलकी माधुरीश्रेणीके द्वारा सभी व्यक्तियोंके चित्तको अपनेमें निबद्ध करनेवाली हैं॥१॥
सूर्यपुत्री वह यमुना, मुझे सदैव पवित्र बनाती रहें कि, जिसने अपनी मनोहर जलधाराके द्वारा, इन्द्रके विशाल खाण्डव–नामक वनको विभूषित कर दिया है एवं जिसके ऊपर खिले हुए श्वेतकमलवृन्दोंमें, खञ्जन आदि पक्षियोंके नृत्य होते रहते हैं तथा अपनेमें स्नान करनेकी इच्छावाले पापियोंके भयंकर पापरूपी–सम्पत्तिको जो अन्धी बना देती हैं अर्थात् जो अपनेमें स्नान करनेकी इच्छामात्रसे महापातकोंको विनष्ट करनेवाली हैं॥२॥
सूर्यपुत्री वह यमुना, मुझे सदैव पवित्र बनाती रहें कि, जो अपने जलविन्दुसे स्पर्श करनेवाले प्राणीमात्रके, दुष्कर्मजनित फलको विनष्ट करनेवाली हैं एवं नन्दनन्दन श्रीकृष्णकी अन्तरङ्गभक्ति, अर्थात् रागानुगाभक्तिकी धाराको बढ़ानेवाली हैं तथा अपने तटपर निवास करनेकी अभिलाषावाले व्यक्तिमात्रका कल्याण करनेवाली हैं॥३॥
सूर्यपुत्री वह यमुना, मुझे सदैव पवित्र बनाती रहें कि, जो सप्तद्वीपमण्डलसे सेवित सातों समुद्रोंका भेदन करनेवाली हैं, अर्थात् सात समुद्रोंको भेदकर, दूसरी नदियोंकी तरह उनमें विलीन न होकर, पार जानेवाली हैं; अतः अचिन्त्य प्रभावशाली हैं एवं जो श्रीकृष्णके द्वारा निर्मित विशाल दिव्यक्रीड़ाओंको जाननेवाली हैं, माथुरेण मण्डलेन चारुणाभिमण्डिता प्रेमनद्धवैष्णवाध्ववर्धनाय पण्डिता। ऊर्मिदोर्विलासपद्मनाभपादवन्दिनी मां पुनातु सर्वदारविन्दबन्धुनन्दिनी॥५॥
अर्थात् अपना आश्रय करनेवाले भक्तोंके हृदयमें उन दिव्यलीलाओंको प्रकटित करनेवाली हैं तथा अपनी शोभाकी ध्वजाओंके द्वारा इन्द्रनीलमणियोंके समूहका तिरस्कार करनेवाली हैं अर्थात् जिसका जल, इन्द्रनीलमणियोंसे भी सुन्दर श्यामवर्णवाला है। नैयायिक लोग यमुना जलमें शुक्ल रूपकी जो कल्पना करते हैं, वह इस उक्तिसे निरस्त हो जाती हैं; क्योंकि अचिन्त्यवस्तुमें तर्क करना उचित नहीं है। आकाशमें फेंके हुए यमुना जलमें शुक्लताकी उपलब्धि तो सूर्य एवं नक्षत्रोंकी प्रभासे कही जा सकती है॥४॥
सूर्यपुत्री वह यमुना, मुझे सदैव पवित्र बनाती रहें कि, जो परम मनोहर मथुरामण्डलके द्वारा मण्डित हैं एवं प्रेमसे बँधे हुए वैष्णवमार्गको अर्थात् रागानुगी भक्तिसंप्रदायको बढ़ानेके लिए पण्डित (निपुण) हैं, अर्थात् अपनेमें स्नान करनेवाले वैष्णवके हृदयमें, रागानुगाभक्तिको स्वयं प्रगट करनेवाली हैं तथा अपनी तरङ्गरूप भुजाओंके विलासके द्वारा, श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी वन्दना करनेवाली हैं॥५॥
सूर्यपुत्री वह यमुना, मुझे सदैव पवित्र बनाती रहें कि, जो परमरमणीय अपने दोनों तीरोंपर रँभाते हुए गोगणसे विभूषित हैं एवं दिव्यगन्धसे युक्त कदंबपुष्पोंकी पंक्तिसे युक्त हैं तथा नन्दलालके भक्तोंके सम्मेलनसे हर्षित होती रहती हैं॥६॥
सूर्यपुत्री वह यमुना, मुझे सदैव पवित्र बनाती रहें कि, जो फूले हुए पंखोंवाले लाखों राजहंसोंके द्वारा शब्दायमान है, अर्थात् जिसके ऊपर लाखों राजहंस गूँजते रहते हैं एवं जो हरिसेवामें आसक्त मनवाले देव–सिद्ध–नर–किन्नर आदिकी पंक्तिसे पूजित हैं तथा अपने तीरपर बहनेवाले वायुके लेशमात्र सम्बन्धसे, प्राणियोंके पुनर्जन्मके बन्धनको काटनेवाली हैं॥७॥
सूर्यपुत्री वह यमुना, मुझे सदैव पवित्र बनाती रहें कि, जो चिद्विलास अर्थात् ब्रह्मविद्यामें अपने जलप्रवाहके द्वारा भूः, भुवः, स्वः—नामक तीनों लोकोंको व्याप्त करनेवाली हैं अर्थात् सातों समुद्रोंकी तरह, भू आदि तीनों लोकोंको भेद कर पार जानेवाली हैं एवं अपना नामसंकीर्तन करनेमात्रसे भी दुर्दमनीय विशाल पापोंके मर्मको जलानेवाली हैं तथा व्रजराजकुमार श्रीकृष्णके अङ्गरागको धारण करनेसे परम सुगन्धित हैं॥८॥
हे सूर्यपुत्रि! देवि! यमुने! सन्तुष्ट बुद्धिवाला जो व्यक्ति, इस अष्टकके द्वारा निर्मल तरङ्गरूप चेष्टावाली एवं सभी देवताओंसे परिवेष्ठित स्वरूपवाली तुम्हारी स्तुति करता है, उस पाठक व्यक्तिके भक्तिप्रवाहको तुम, अविद्यापर्यन्त समस्त पापोंसे विमुक्त करनेवाले कमलनयन श्रीकृष्णमें बढ़ाती रहो। आपके श्रीचरणोंमें मेरी यही प्रार्थना है॥९॥