श्रीवृन्दावनाष्टकम्
यदि योगसिद्धि मुझे प्राप्त न हो तो इसकी मुझे कोई चिन्ता नहीं है, यदि मेरी मुक्ति न हो तो इससे भी मेरी हानि नहीं है, यदि वैकुण्ठलोकमें मुझे पार्षदभाव न मिले तो भी मेरी कोई क्षति नहीं है, और यदि भगवद्विषयक विशाल प्रेम भी मेरे हृदयमें न हो तो भी मेरा निवास तो श्रीवृन्दावनमें ही होता रहे॥१॥
जिस वृन्दावनके माधुर्यकी विशालताको देखकर, जगद्गुरु ब्रह्मा एवं श्रेष्ठभक्तोंके चूड़ामणि उद्धवने भी, जिस वृन्दावनमें तृणसम्बन्धी जन्मकी याचना की थी, अतः मेरा निवास तो इस वृन्दावनमें ही होता रहे॥२॥
रासलीलामें श्रीकृष्णके अन्तर्हित हो जानेपर, प्रेमकी पताका–रूप–गोपियोंने भी “किं ते कृतं क्षिति! तपो” भा. १०/३०/१० अर्थात् हे पृथ्वीदेवि! तुमने ऐसा कौनसा अपूर्व तप किया है कि, जिससे तुम वृन्दावनमें श्रीकृष्णके चरणोंके स्पर्शरूप उत्सवसे पुलकित रोमाञ्चोंसे सुशोभित हो रही हो, इत्यादि रूपसे भूमिके यशकी स्तुति जिस ध्येयसे की थी, उसी ध्येयसे मेरा नित्यनिवास तो श्रीकृष्णचरणचिह्नोंसे अंकति इस वृन्दावनमें ही होता रहे॥३॥
गोपाङ्गनाओंकी प्रेममयी आसक्ति ही जिसमें प्रधान है एवं प्रेममयी जिस आसक्तिमें ही रसको परिपूर्णता मिली है, क्योंकि “निश्चितरूपसे रसके मूर्तिमान स्वरूप तो रसिकशेखर वे नन्दनन्दन ही हैं” इस भावको करनेवाली ‘रसो वै स’ इत्यादि रूपवाली श्रुति भी जिसमें प्रमाण है; अतः मेरा निवास तो उस वृन्दावनमें ही होता रहे॥४॥
मेरा नित्यनिवास तो इस वृन्दावनमें ही होता रहे कि—जो भाण्डीरवट, गोवर्धन एवं रासपीठ इन तीन विशिष्टस्थलोंके कारण, तीन सीमावाला है एवं व्यापक होनेके कारण अपरिमित होकर भी जो पाँच योजनसे परिमित है॥५॥
जिस वृन्दावनमें श्रीवृषभानुनन्दिनीका आधिपत्य है एवं जिस वृन्दावनके द्वारा भक्तजनमात्रमें भगवद्सम्बन्धी प्रेमसुख प्रकट हो सकता है तथा जिस वृन्दावनमें मेरी बलवती आशा है, अतः मेरा नित्यनिवास तो इस वृन्दावनमें ही होता रहे॥६॥
महारासविलासकी जिस लीलाको नारायणपत्नी लक्ष्मीदेवी, अनेक तपस्याओंके द्वारा भी नहीं प्राप्त कर पाईं, वह महारासविलासलीला जिस वृन्दावनमें नित्य ही होती रहती है; अतः मेरा नित्यनिवास तो शोभायमान एवं मनोहर निकुञ्जपुञ्जसे युक्त उस वृन्दावनमें ही होता रहे॥७॥
जिस वृन्दावनमें रुरु (काला मृग), न्यंकु (अनेक सींगोवाला मृग) आदि अनेक मृग, निःशंक खेलते रहते हैं एवं कोयल–भ्रमर–तोता आदि अनेक पक्षी जिसमें गूँजते रहते हैं एवं मयूरगण जिसमें नाचते रहते हैं, उस वृन्दावनमें ही मेरा नित्यनिवास होता रहे॥८॥
निश्चलबुद्धिवाले जो व्यक्ति वृन्दावनके इस अष्टकका ऊँचे–स्वरसे भावपूर्वक पाठ करते हैं, वे व्यक्ति वृन्दावनाधीश्वर श्रीराधाकृष्णके पादपद्मोंकी सेवाको, इस जन्मके अन्तमें ही साक्षात् प्राप्त कर लेते हैं। इस अष्टकमें “उपजाति” नामक छन्द है॥९॥