Śrī Gauḍīya Gītiguccha
Kirtan

श्रीगोवर्धनवासप्रार्थनादशकम्

Gauḍīya Vaiṣṇava Tradition5 min read
KrishnaRadhaMahaprabhuNityanandaRasaBhakti
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निजपतिभुजदण्डच्छत्रभावं प्रपद्यप्रतिहतमदधृष्टोद्दण्डदेवेन्द्रगर्व ।अतुलपृथुलशैलश्रेणिभूप! प्रियं मेनिज–निकट–निवासं देहि गोवर्धन! त्वम्॥१॥
प्रमदमदनलीलाः कन्दरे कन्दरे तेरचयति नवयूनोर्द्वन्द्वमस्मिन्नमन्दम्।इति किल कलनार्थं लग्नकस्तद्द्वयोर्मेनिज–निकट–निवासं देहि गोवर्धन! त्वम्॥२॥

हे अतुल विस्तारवाली पर्वतश्रेणीके भूप! श्रीमन् गोवर्धन! आप मुझको अपने निकट निवास प्रदान कीजिए। आपके निकट रहना ही मुझको प्रिय लगता है, क्योंकि आप अपने स्वामी श्रीकृष्णके भुजारूप–दण्डके ऊपर छत्रभावको प्राप्त होकर, ऐश्वर्यके मदसे धृष्ट एवं उद्दण्ड, देवेन्द्रके गर्वको विनष्ट करनेवाले हो!॥१॥

हे गोवर्धन! आप, मुझको अपने निकट ही निवास प्रदानकीजिए; क्योंकि नवयुवकस्वरूप श्रीराधाकृष्णकी युगलजोड़ी, आपकीप्रत्येक कन्दरामें, हर्षप्रद प्रेममयी लीलाओंको विशेषरूपसे करतीरहती हैं। मैं, उन दोनोंकी लीलाओंको देखनेके लिए मध्यस्थ बननाचाहता हूँ॥२॥
अनुपम–मणिवेदी–रत्नसिंहासनोर्वी–रुहझर–दरसानुद्रोणि–संघेषु रंगैः।सह बल–सखिभिःसंखेलयन्स्वप्रियंमेनिज–निकट–निवासं देहि गोवर्धन! त्वम्॥३॥
रसनिधि–नवयूनोः साक्षिणीं दानकेले–र्द्युतिपरिमलविद्धां श्यामवेदीं प्रकाश्य।रसिकवरकुलानां मोदमास्फालयन्मेनिज–निकट–निवासं देहि गोवर्धन! त्वम्॥४॥

हे गोवर्धन! आप, मुझे अपने निकट ही निवासस्थान दे दीजिए। यदि कहो कि, श्रीराधाकृष्णकी लीलाएँ तो संकेत आदि वनोंमें भी होती हैं, उनके निकट ही क्यों नहीं रहना चाहते हो? इसके उत्तरमें कहते हैं कि, आप तो अपने प्यारे श्रीकृष्णको अपनी अनुपम मणिमयी वेदियोंपर, रत्नमय सिंहासनपर, वृक्षोंके नीचे एवं झरनोंमें, दरारोंमें, शिखरोंके ऊपर तथा गुफाओंकी श्रेणीमें, बलदेव एवं श्रीदामा आदि सखाओंके साथ कौतुकपूर्वक क्रीड़ा कराते हुए प्रसन्न करते रहते हो॥३॥

हे गोवर्धन! आप, मुझे अपने निकट ही निवासस्थान दे दीजिए; क्योंकि आप रसनिधि नवयुवक–श्रीराधाकृष्णकी दानकेलिकी साक्षिणी एवं कान्ति तथा मनोहर गन्धसे युक्त, श्यामवेदीको प्रकाशित करके, रसिकश्रेष्ठ श्रीकृष्णभक्तोंके आनन्दको बढ़ाते हुए विद्यमान हो॥४॥

हरिदयितमपूर्वं राधिका–कुण्डमात्म–प्रियसखमिह कण्ठे नर्मणाऽलिंग्य गुप्तः।नवयुवयुग–खेलास्तत्र पश्यन् रहो मेनिज–निकट–निवासं देहि गोवर्धन! त्वम्॥५॥
स्थल–जल–तल–शष्पैर्भूरुहच्छायया चप्रतिपदमनुकालं हन्त संवर्धयन् गाः।त्रिजगति निजगोत्रं सार्थकं ख्यापयन्मेनिज–निकट–निवासं देहि गोवर्धन! त्वम्॥६॥

यदि कहो कि, मेरे निकटवर्ती बहुतसे स्थान हैं, तुम कौनसे स्थानमें रहना चाहते हो? इसके उत्तरमें कहते हैं कि— हे गोवर्धन! आप, मुझे अपने निकटवर्ती राधाकुण्डमें निवास दे दीजिए; क्योंकि वह राधाकुण्ड, श्रीकृष्णका अतिशय प्रिय है, अतः अपूर्व है; और तुम्हारा भी प्यारा सखा है; इसी कारण आप, उस राधाकुण्डको परिहासपूर्वक कण्ठमें आलिङ्गन करके, उसी राधाकुण्डमें गुप्त होकर नवयुवक श्रीराधाकृष्णकी क्रीड़ाओंको देखते रहते हो। मेरे लिए भी वही एकान्तस्थान उचित है। मैं भी वहींपर बैठकर, राधाकृष्णकी लीलाओंको आपकी तरह अनुभव करता रहूँ॥५॥

हे गोवर्धन! आप, मुझे अपने निकट ही निवासस्थान दे दीजिए; क्योंकि आप स्थल–जल–तल–तृण एवं वृक्षोंकी छायाके द्वारा, प्रतिक्षण पग–पगपर, गोगणकी वृद्धि करते हुए “गाः वर्धयतीति” इस व्युत्पत्तिके अनुसार अपने गोवर्धन नामको, तीनों लोकोंमें सार्थक विख्यात करते रहते हो। अतः आपके निकट निवास स्थान प्राप्त हो जानेसे, आपके निकट गोचारणार्थ आनेवाले, मेरे इष्टदेव श्रीकृष्णका दर्शन, मुझे भी सम्भव हो सकता है॥६॥

सुरपतिकृत–दीर्घद्रोहतो गोष्ठरक्षांतव नव–गृहरूपस्यान्तरे कुर्वतैव।अघ–बक–रिपुणोच्चैर्दत्तमान! द्रुतं मेनिज–निकट–निवासं देहि गोवर्धन! त्वम्॥७॥
गिरिनृप! हरिदासश्रेणीवर्येति–नामा–मृतमिदमुदितं श्रीराधिकावक्त्रचन्द्रात्।व्रजजन–तिलकत्वेक्लृप्त!वेदैःस्फुटं मेनिज–निकट–निवासं देहि गोवर्धन! त्वम्॥८॥

यदि कहो कि, तुम अपने मनमें, जो–जो भावना करके, मेरे निकट निवास चाहते हो, उन भावनाओंकी पूर्ति तो श्रीवृन्दावनके किसी प्रदेशमें निवास करनेपर भी हो सकती है, फिर मेरे निकट ही क्यों निवास करना चाहते हो? इसके उत्तरमें कहते हैं कि— हे गोवर्धन! आप, मुझे अपने निकट शीघ्र ही निवास दे दीजिए, क्योंकि नवीन गृहरूप आपके भीतर स्थापित किए हुए ब्रज की, इन्द्रके द्वारा किए गए विशाल द्रोहसे रक्षा करते हुए, अघारि एवं बकारि श्रीकृष्णने, आपके लिए विशेष सम्मान दिया है। श्रीकृष्णका यह स्वभाव है कि, अपने द्वारा सम्मानित व्यक्तियोंके निकट निवास करनेवाले, अयोग्य जनपर भी कृपा कर देते हैं, अतः आपके निकट रहनेसे, मेरे ऊपर भी श्रीकृष्ण कृपा हो सकती है॥७॥

यदि कहो कि “पंचयोजनमेवास्ति वनं मे देहरूपकम्” इत्यादि उक्तिमें, श्रीकृष्णके देहरूपसे निरूपित, श्रीवृन्दावनके किसी प्रदेशमें निवास करनेसे, सभी अभीष्टोंकी सिद्धि हो जायेगी, फिर मेरे निकट ही क्यों निवास करना चाहते हो? इसके उत्तरमें कहते हैं कि— हे गिरिराज महाराज! देखो, श्रीमती राधिकाके मुखचन्द्रसे “हन्तायमद्रिरवला हरिदासवर्यः” भा. १०/२१/१८ इत्यादि रूपसे, आपका “आप हरिदासोंकी श्रेणीमें श्रेष्ठ हो” यह नामरूपी–अमृत प्रकट हुआ है; अतः सब वेदोंने आपको, ब्रजके अभिनव तिलकरूपसे प्रतिष्ठित कर दिया है, यह बात स्पष्ट है। इसलिए “अधिकस्याधिकं फलम्” इस न्यायके अनुसार, श्रेष्ठतमके निकट निवास करना ही योग्य है; अतः हे गोवर्धन! मुझे अपने निकट ही निवासस्थान प्रदान कर दीजिए॥८॥

निज–जनयुत–राधाकृष्णमैत्रीरसाक्त–व्रजनर–पशु–पक्षि ब्रात–सौख्यैकदातः।अगणित–करुणत्वान्मामुरीकृत्य तान्तंनिज–निकट–निवासं देहि गोवर्धन! त्वम्॥९॥
निरुपधि–करुणेन श्रीशचीनन्दनेनत्वयिकपटि–शठोऽपि त्वत्प्रियेणार्पितोऽस्मि।इति खलु मम योग्यायोग्यतां तामगृह्णन्निज–निकट–निवासंदेहि गोवर्धन! त्वम्॥१०॥

यदि कहो कि, अपने अभीष्टको, किसी दूसरे व्रजवासीसे ही मांग लो, मेरी प्रार्थनासे क्या प्रयोजन है? इसके उत्तरमें कहते हैं कि— आप तो सखी–सखागणरूप स्वजनोंसे परवेष्टित, श्रीराधाकृष्णकी मित्रतारूप–रससे युक्त, ब्रजके नर–नारी, पशु–पक्षी आदि प्राणीमात्रके अद्वितीय सुखदाता हो, अर्थात् परमदयालु होनेके कारण, श्रीकृष्णके हस्तके स्पर्शमात्रसे स्वयं उठकर, श्रीकृष्णके वाम–हस्तपर विराजमान होकर, ब्रजवासीमात्रकी रक्षा करनेवाले हो; अतः ऐसे दयालुको छोड़कर, दूसरे कौनसे व्यक्तिसे, अपने अभीष्टकी प्रार्थना करूँ? यदि कहो कि, मैंने अपने नीचे प्रविष्ट करके जिन ब्रजवासियोंकी रक्षा की थी, वे तो श्रीकृष्णकी प्रीतिसे युक्त थे, तुम तो उस प्रीतिके लेशसे रहित हो; अतः तुम्हारे लिए अपने निकट किस प्रकार निवास दूँ? इसके उत्तरमें कहते हैं कि, हे गोवर्धन! आप अनन्त करुणासे युक्त हो; अतः मुझ दीन–दुःखीको भी अङ्गीकार करके, अपने निकट निवासस्थान दे दीजिए। तात्पर्य—आप अपनी सहज करुणासे अपने निकट बसाकर, मुझको श्रीकृष्णका प्रीतिपात्र भी बना दोगे॥९॥

मुझ जैसे अयोग्य व्यक्तिके लिए, अपने निकट निवास देनेके विषयमें मुख्य कारण सुनिए—यद्यपि मैं कपटी एवं शठ हूँ, तो भी मुझे परमदयालु शचीनन्दन श्रीकृष्णचैतन्यदेवने तुम्हारे निकट अर्पित कर दिया है। श्रीशचीनन्दन आपके परमप्रिय हैं, अतः प्रियके वाक्य, प्रियजनको अवश्य ही मान लेने चाहिए। यदि कहो कि, पुरुषोत्तमक्षेत्रसे तुमको यहाँ भेजनेवाले श्रीशचीनन्दनका कुछ प्रयोजन अवश्य होगा, सो बात नहीं है; क्योंकि वे तो अकारण रसद–दशकमस्य श्रील–गोवर्धनस्य क्षितिधर–कुलभर्तुर्यः प्रयत्नादधीते। ससपदिसुखदेऽस्मिन्वासमासाद्यसाक्षा– च्छुभद–युगलसेवारत्नमाप्नोति तूर्णम्॥११॥

करुणा–वरुणालय हैं। इसलिए हे गोवर्धन! मेरी उस योग्यता एवं अयोग्यताको ग्रहण न करते हुए, कृपया आप मुझे अपने निकट ही निवासस्थान प्रदानकर दीजिए॥१०॥

यह “गोवर्धनवासप्रार्थनादशक” भक्तिरसको देनेवाला है; अतः, जो व्यक्ति, पर्वतकुलके स्वामी श्रीमान् गोवर्धनके, इस दशकका प्रयत्नपूर्वक अध्ययन करता है, वह व्यक्ति, सुखप्रद इस गोवर्धनमें शीघ्र ही साक्षात् निवास पाकर, शुभप्रद श्रीराधाकृष्णकी सेवारूपरत्नको, शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है। इस प्रार्थनादशकमें “मालिनी” नामक छन्द है॥११॥

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