वृषभासुरके वधके पश्चात्, ‘हे वृषभ–शत्रु’! तुम हमारी गोष्ठीमें आ रहे हो, हमें स्पर्श मत करो—श्रीमती राधिकाके द्वारा ऐसा कहने पर श्रीकृष्णने अपनी ऐड़ीके प्रहारसे जिसको प्रकट किया है, वह अत्यन्त विमल जलसे परिपूर्ण श्रीश्यामकुण्ड ही हमारी गति है॥१॥
तीनो लोकोंमें पापनाशक जितने भी तीर्थ हैं व्रजेन्दनन्दन श्रीकृष्णने उन सबको बुलाकर जहाँ एकत्र निवास कराया है और ये ही उनकी अत्यन्त प्रगाढ़ महिमाका द्योतक है वे अत्यन्त विमल जलसे परिपूर्ण श्रीश्यामकुण्ड ही हमारी गति हैं॥२॥
‘हे कृशाङ्गि राधे! तुम भी इस पवित्र जलसे परिपूर्ण सुन्दर तीर्थरूप इस पावन कुण्डमें स्नान करो’—श्रीकृष्ण द्वारा श्रीमती राधिकाको भी जिसमें स्नान करनेके लिए प्रार्थना की गयी है, वही पवित्र जलसे युक्त श्रीश्यामकुण्ड ही हमारी गति हैं॥३॥
कृष्णकी एड़ीके आघातसे प्रकट होने वाले कुण्ड (श्यामकुण्ड)में स्नान करनेसे कृष्णके कुण्डमें अवस्थित निखिल तीर्थोंके द्वाराश्रीकृष्णका वृषभासुरके विनाशसे उत्पन्न पापको नष्ट होते देखकरवृषभानुनन्दिनी श्रीमतीराधिकाने अपनी अखिल सखियोंके साथ ठीकवैसे ही एक–दूसरे कुण्डका प्रकाश किया था वही विमल जलसेयुक्त श्रीश्यामकुण्ड ही हमारी गति हों॥४॥
निखिल तीर्थोंको श्रीमती राधिकाजी द्वारा अपने प्रकटित कुण्डमें प्रवेश करनेसे निषेध करने पर उन्होंने (निखिल तीर्थोंने) अत्यन्त भयभीत होकर विनयपूर्वक श्रीकृष्णचन्द्रके श्रीचरणोंमें— अगतियोंकी एकमात्र गति श्रीमती राधिकाजी हमें त्याग देनेपर हमारी क्या गति होगी? इस प्रकार जहाँ पर निवेदन किया था, वही अत्यन्त पवित्र जलयुक्त श्रीश्यामकुण्ड ही मेरी गति हैं॥५॥
जहाँ पर तीर्थोंको अतिशय विकल देखकर श्रीकृष्णके द्वाराउनको सेवाधिकार (श्रीकुण्डमें प्रवेशाधिकार) प्रदान करनेके लिएश्रीमती राधिकाके प्रति अनुनय–विनय भरे वचनोंसे भङ्गीपूर्वक प्रार्थनाकरने पर श्रीमती राधिकाने अतिशय कोमल प्रणतियुक्त वचनोंसेश्रीकृष्णसे ऐसा कहा था कि—‘मैं सुप्रसन्न हूँ’ वही अतिशय विमलजलयुक्त श्रीश्यामकुण्ड ही मेरी गति हैं॥६॥
जिस श्यामकुण्डमें प्रविष्ट हुए तीर्थोंने अतिशय मनोज्ञ पद्योंके द्वारा श्रीमती राधिकाको सुप्रसन्न कर तथा श्रीमती राधिकाकी अपने प्रति कृपा लक्ष्यकर द्रवीभूत होकर (जलरूपसे) दोनों कुण्डोंके मध्यवर्ती स्थानको भेदकर ब्रजके नवीन युव–द्वन्द्व (युगलकिशोर) के श्रीराधाकुण्डमें आश्रय ग्रहण किया था, वही अतिशय विमल जलसे युक्त श्रीश्यामकुण्ड मेरी एकमात्र गति हैं॥७॥
जिनके अतिशय निकट तटपर श्रीमती राधिका आदि सखियोंने विविध कुसुमवल्लियों तथा कल्पवृक्षोंसे सुशोभित कुञ्जोंका निर्माणकर सुबल और मधुमङ्गल वटु प्रमुख सखाओंको प्रदान किया था, वह अतिशय विमल जलयुक्त श्रीश्यामकुण्ड ही मेरी गति हैं॥८॥
जो सुमेधा (बुद्धिमान) व्यक्ति इस श्यामकुण्डाष्टकका प्रीतिपूर्वक पाठ करते हैं, नवजलधरकान्ति युक्त श्रीकृष्ण और स्वर्णकान्ति विशिष्ट श्रीराधिकाके प्रति अनुराग हेतु उनको ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण सखियोंसे परिवेष्टित श्रीमती राधिकाके सहित सहज ही भजनीय होते हैं तथा सुशीघ्र ही प्राप्त होते हैं॥९॥