नित्यकालसृष्ट – विप्र – गौरवालि – वन्दनः
गोपराजकुमार वे श्रीकृष्ण, मेरे लिये अपने श्रीचरणोंकी सेवा प्रदान करें कि जो प्रेमरूप–सुवर्णके द्वारा विभूषित मनवाले बन्धुवर्गसे सदैव आनन्दित रहते हैं अथवा पूर्वोक्त गुणविशिष्ट बन्धुजन जिनका अभिनन्दन करते हैं एवं जिनके ललाट भूतलपर संलग्न हैं, ऐसे इन्द्र आदि लोकपालोंकी श्रेणीसे जो प्रतिदिन वन्दित होते रहते हैं और जो अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक होकर भी, प्रतिदिन प्रातःकाल आदि यथोचित समयमें, ब्राह्मण एवं गुरुजनोंकी श्रेणीकी वन्दना करते रहते हैं॥४॥
गोपराजकुमार वे श्रीकृष्ण, मेरे लिये अपने श्रीचरणोंकी सेवा प्रदान करें कि जो इन्द्र एवं कालियनागकी गर्मीको अनायास ही ठण्डी करनेवाले हैं तथा कंस एवं वत्सासुरको अनायास मारनेवाले हैं एवं इन्द्रादिकोंके गर्वखण्डन आदि अपनी क्रीड़ारूप वर्षाके द्वारा, जो भक्तरूप–चातकोंको पुष्ट करनेवाले हैं और जो अपने पराक्रम, विशुद्ध स्वभाव तथा विशुद्ध लीला आदिके द्वारा, अपने ब्रजवासियोंको आनन्दित करनेवाले हैं॥५॥
गोपराजकुमार वे श्रीकृष्ण, मेरे लिये अपने श्रीचरणोंकी सेवा प्रदान करें कि जो अपनी निकुञ्जलीला एवं रासलीलारूप–सुधाके द्वारा, श्रीराधिका आदि गोपियोंको सन्तुष्ट करनेवाले हैं एवं जो निकुञ्जलीला एवं रासलीला आदिरूप अपनी क्रीड़ाओंमें होनेवाले हास–परिहासके द्वारा श्रीराधिका आदिकोंकी सखियोंका पोषण करनेवाले हैं और जो अपने लोकोत्तर प्रेम–स्वभाव–क्रीड़ा–कीर्ति आदिके द्वारा, सभीके चित्तको आनन्दित करनेवाले हैं॥६॥
गोपराजकुमार वे श्रीकृष्ण, मेरे लिये अपने श्रीचरणोंकी सेवा प्रदान करें कि जो कामगन्धशून्य रासलीलाके द्वारा अपनी विशुद्धभक्तिके सन्मार्गको दिखानेवाले हैं एवं अपने विचित्र रूप तथा वेषके द्वारा कामश्रेणीके मनका मन्थन करनेवाले हैं और जो गोपियोंके ऊपर अपने नेत्रके कोनेसे ही भावसमूहकी सूचना करनेवाले हैं॥७॥
गोपराजकुमार वे श्रीकृष्ण, मेरे लिये अपने श्रीचरणोंकी सेवा प्रदान करें कि जो पुष्पोंका चयन करनेवाली श्रीमती राधिकाके स्पर्शकी प्राप्तिके विषयमें तृष्णासे युक्त रहते हैं एवं प्रेममयी कुटिलतासे रमणीय राधिकाके श्रीमुखके दर्शनसे जो हर्षित रहते हैं और जो इस ब्रजमें राधिकाके वक्षःस्थलपर मनोहर चन्दनके लेपस्वरूप हैं॥८॥
जो व्यक्ति, राधिकाके प्राणप्यारे एवं लक्ष्मी आदि दिव्याङ्गनाओंके लिए, जिनका दर्शन भी दुर्लभ है, ऐसे श्रीकृष्णकी स्तुति, इस अष्टकके द्वारा करते हैं, प्रसन्न चित्तवाले श्रीकृष्ण, उस व्यक्तिको ब्रजमण्डलके श्रीवृन्दावनमें, राधिकाके अङ्ग–सङ्गसे प्रसन्न हुए, अपने श्रीचरणोंकी सेवामें लगा लेते हैं। इस अष्टकमें ‘तूणक’—नामक छन्द है॥९॥